back to top
26.1 C
New Delhi
Saturday, March 28, 2026
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

इस दिन मनाया मोक्षदा एकादशी का व्रत, जो दिलाता है जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति

मोक्षदा एकादशी 1 दिसंबर 2025 को है, जो जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति दिलाने और गीता जयंती के साथ जुड़ी होने के कारण अत्यंत पवित्र मानी जाती है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। हिन्दू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष (अगहन) माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ने वाली मोक्षदा एकादशी का सनातन धर्म में सर्वोपरि स्थान है। इस वर्ष यह शुभ तिथि 1 दिसंबर 2025, सोमवार को मनाई जाएगी। इसी पावन दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है, जिससे इस एकादशी का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

शास्त्रों में मान्यता है कि यह एकादशी सिर्फ पापों का नाश नहीं करती, बल्कि सच्चे मन से व्रत करने वाले भक्त को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति (मोक्ष) प्रदान करने की क्षमता रखती है।

मनुष्य जीवन में मोक्षदा एकादशी का चमत्कारी महत्व

‘मोक्ष’ प्रदान करने की क्षमता रखने वाली इस एकादशी को आध्यात्मिक उन्नति का शिखर माना गया है।मान्यता है कि यह व्रत व्यक्ति के संचित पापों को नष्ट करता है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु के पूर्णावतार श्रीकृष्ण की पूजा और गीता का पाठ करना साक्षात् मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत का पुण्यफल पितरों को भी प्राप्त होता है। यदि कोई भक्त अपने पितरों के निमित्त यह व्रत रखता है, तो उनके पूर्वजों को भी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।पूरे दिन उपवास रखने, रात्रि जागरण, जप और कीर्तन करने से मन शुद्ध होता है, शरीर स्वस्थ रहता है और आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।

 विधिवत पूजा और व्रत के कठोर नियम

मोक्षदा एकादशी का व्रत नियमों में कठोरता मांगता है, तभी इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। दशमी तिथि से ही तामसिक भोजन (मांस, प्याज, लहसुन) का त्याग कर दें। एकादशी के दिन स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर श्रीहरि भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की विधिवत पूजा का संकल्प लें।दिनभर उपवास रखें (फलाहार कर सकते हैं) और विष्णु सहस्रनाम या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।इस दिन गीता पाठ करना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि इससे श्रीकृष्ण के उपदेशों को जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा मिलती है।

व्रत की पूर्णता द्वादशी तिथि पर ही मानी जाती है। एकादशी व्रत का पारण (व्रत तोड़ना) द्वादशी तिथि पर निर्धारित समय में ही करना चाहिए। पारण समय के उल्लंघन से व्रत का फल नष्ट हो जाता है। यह एकादशी भक्ति, समर्पण और त्याग का प्रतीक है, जो मनुष्यों को भौतिक मोह से ऊपर उठकर परमार्थ के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

Advertisementspot_img

Also Read:

spot_img

Latest Stories

⌵ ⌵ ⌵ ⌵ Next Story Follows ⌵ ⌵ ⌵ ⌵