नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। सनातन धर्म में नारी शक्ति की आस्था समर्पण और पति के लिए अखंड आयु की कामना का प्रतीक वट सावित्री व्रत जिसे महर्षि सावित्री की उस अमर कथा पर आधारित है। जिसमें सावित्री ने पति सत्यवान कोयमराज से वापस प्राप्त किया था। वट वृक्ष के नीचे बैठकर उपवास, पूजन और व्रत कथा सुनने से इस दिन ऐसे कई प्रमुख अनुष्ठान होते है। अगर आप भी इस व्रत को पहली बार कर रही हैं, तो आपको कुछ धार्मिक नियमों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। आइए जानते है व्रत और पूजा में होनेवाली धार्मिक बातें।
सबसे पहले व्रती को व्रत प्रारंभ करने से पूर्व श्रद्धा और निष्ठा के साथ सुबह नित्य क्रिया कर साफ वस्त्र धारण कर संकल्प लेंना चाहिए। जिसमें संकल्प का अर्थ है, दिनभर उपवास रखकर, पवित्रता का पालन करते हुए व्रत कथा को सुनना व पूजन करना। इस दिन किसी भी प्रकार की नकारात्मकता, क्रोध से बचना चाहिए।
वट वृक्ष (बरगद) का पूजन
इस दिन वट वृक्ष यानी बरगद का पूजन अत्यंत महत्व होता है, इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा कर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं, जिसमें पूजा के लिए कच्चा सूत धागा, लाल चूड़िया, हल्दी, रोली, फूल, मिठाई, जल कलश, अक्षत आदि को पास में रखकर वट वृक्ष को जल चढ़ाकर सात या एक सौ आठ बार परिक्रमा कर सूत लपेटना चाहिए।
सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण
इस व्रत का मूल आधार सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा है जिसे व्रत के दौरान पाठ अनिवार्य माना गया है। जिससे ये सीख मिलती है कि, नारी के तप और प्रेम मेंइतनी शक्ति होती है कि वह मृत्यु जैसे बल को भी पराजित कर सकती है.
– श्रद्धा से रखें उपवास और करें दान
वट सावित्री व्रत में श्रद्धा से रखें उपवास यदि स्वास्थ्य अनुमति दे, तो निर्जल व्रत करें, वरना फलाहार ले सकते है, शाम को पूजन के बाद सुहागिनों को वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, फल एवं दक्षिणा का दान करें। इससे पति की दीर्घायु और सौभाग्य की रक्षा होतीहै।
– पूजा के बाद पति का आशीर्वाद ले
पूजन के बाद पति का आशीर्वाद ग्रहण कर उनका आशीर्वाद लें, यह परंपरा विवाह-संस्कार की मर्यादा और गृहस्थ जीवन में प्रेम, विश्वास और धर्म की भावना को दृढ़ करता है।
यदि आप वट सावित्री व्रत पहली बार कर रही हैं, तो श्रद्धा, नियम के साथ इस व्रत को करें,यह व्रत नारी शक्ति, प्रेम और त्याग का पर्व है, जो गृहस्थ जीवन को सुख, समृद्धि और सौभाग्य से भर देता है।





