नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। विश्वभर में उत्साह और उल्लास के साथ मनाए जाने वाले ईसाई धर्म के सबसे बड़े त्योहार क्रिसमस की तैयारी चरम पर है। 25 दिसंबर को हर साल प्रभु यीशु मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाए जाने वाले इस पर्व के पीछे कई ऐतिहासिक और दिलचस्प मान्यताएं जुड़ी हैं। यह सिर्फ प्रभु यीशु का जन्मदिवस नहीं, बल्कि उपहार देने वाले सैंटा क्लॉज और सजावटी क्रिसमस ट्री जैसी सदियों पुरानी परंपराओं का संगम भी है।
25 दिसंबर ही क्यों? इतिहास और रोमन कनेक्शन
भले ही यीशु मसीह के जन्म की सटीक तारीख अज्ञात हो, लेकिन 25 दिसंबर को ही इस उत्सव की शुरुआत एक ऐतिहासिक फैसले के तहत हुई थी।सबसे पहले इतिहासकार सेक्सटस जूलियस अफ्रीकानस (Sextus Julius Africanus) ने 221 ईस्वी में इस तारीख को यीशु का जन्मदिन घोषित करने का निर्णय लिया। यह फैसला सदियों से दुनिया भर में कायम है।
सूर्य और मैरी की मान्यता
रोमन संस्कृति में, 25 दिसंबर को सर्दियों के बाद ‘सूर्य के जन्म’ का दिन माना जाता था, जब दिन फिर से लंबे होने लगते हैं। कई मान्यताओं के अनुसार, शुरुआती ईसाइयों ने इस तारीख को अपनाया ताकि मूर्तिपूजक त्योहारों से मेल खाकर धर्म का प्रचार आसान हो सके।एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता मैरी 25 मार्च को गर्भवती हुई थीं, और ठीक नौ महीने बाद, 25 दिसंबर को यीशु का जन्म बैथलहम में हुआ था।
कौन हैं सैंटा क्लॉज? तुर्की के दयालु संत निकोलस
क्रिसमस पर उपहार और खुशियां लाने वाले सैंटा क्लॉज की कहानी प्रभु यीशु के जन्म से लगभग 300 साल बाद शुरू हुई। सैंटा का असली नाम संत निकोलस था।यह कहानी 280 ईस्वी के आसपास तुर्की में शुरू हुई थी। संत निकोलस दयालुता के लिए जाने जाते थे। वह जरूरतमंदों, गरीब और बीमार लोगों की गुप्त रूप से मदद करते थे और उन्हें उपहार देते थे। संत निकोलस के इसी दान और दया के भाव ने समय के साथ सफेद दाढ़ी वाले, लाल कपड़े पहने और उत्तरी ध्रुव में रहने वाले सैंटा क्लॉज का रूप ले लिया। बच्चों को नए कपड़े, मिठाइयाँ और उपहार देने की परंपरा उन्हीं से जुड़ी हुई है।
उत्सव की रौनक: क्रिसमस ट्री और घंटियाँ
क्रिसमस ट्री सजाना इस त्योहार का अभिन्न अंग है। लोग घरों को रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाते हैं और केक काटकर खुशियाँ बाँटते हैं। चर्च में विशेष प्रार्थनाएँ होती हैं, और यीशु की माता मैरी और पिता जोसेफ के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। बच्चों के लिए यह त्योहार किसी जादू से कम नहीं होता, जो बेसब्री से सैंटा क्लॉज का इंतजार करते हैं।यह त्योहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि दया, दान और खुशियाँ बाँटने की विश्वव्यापी परंपरा का भी द्योतक है।
मिडनाइट मास आधी रात की प्रार्थना की पवित्र परंपरा
क्रिसमस के सबसे पवित्र और भावनात्मक क्षणों में से एक मिडनाइट मास है, जिसे आधी रात की प्रार्थना या आधी रात का पूजन भी कहा जाता है। यह परंपरा यीशु मसीह के जन्म के समय को समर्पित है।
कब और क्यों होती है मिडनाइट मास?
यह प्रार्थना ठीक 24 दिसंबर की रात को शुरू होती है और 25 दिसंबर की मध्यरात्रि (12:00 AM) तक चलती है।यह माना जाता है कि प्रभु यीशु मसीह का जन्म ठीक मध्यरात्रि को बैथलहम की गोशाला में हुआ था। यह मास उसी पवित्र क्षण का जश्न मनाने और क्रिसमस दिवस का आधिकारिक शुभारंभ करने के लिए आयोजित किया जाता है।यह मास प्रभु के आने की खुशी और अंधेरे (पाप/अज्ञान) पर उजाले (मुक्ति/ज्ञान) की जीत का प्रतीक है।मिडनाइट मास का माहौल अत्यधिक उत्साहपूर्ण और श्रद्धा से भरा होता है।चर्च रंग-बिरंगी मोमबत्तियों और रोशनियों से जगमगाते हैं, जबकि अधिकांश अन्य सेवाएं दिन के उजाले में होती हैं। इस समय विशेष रूप से चर्च की घंटियाँ बजाई जाती हैं।
इस दौरान विशेष क्रिसमस कैरल (भजन) गाए जाते हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध साइलेंट नाइट, ओ होली नाइट जैसे गीत शामिल होते हैं।कैथोलिक और कुछ अन्य ईसाई संप्रदायों में, इस मास में पवित्र यूखरिस्त या प्रभु भोज का आयोजन किया जाता है, जो यीशु के शरीर और रक्त के रूप में रोटी और दाखरस को ग्रहण करने की परंपरा है। जैसे ही घड़ी में 12 बजती है, लोग एक-दूसरे को गले मिलकर या हाथ मिलाकर ‘मेरी क्रिसमस’ कहते हुए यीशु के आगमन की खुशी साझा करते हैं।माना जाता है कि मिडनाइट मास की परंपरा की शुरुआत ईसा के शुरुआती सदियों में यरूशलेम में हुई, और बाद में यह प्रथा चौथी शताब्दी के आसपास रोम में फैल गई। आज, दुनिया भर के गिरजाघरों में यह सबसे भव्य और सबसे अधिक भीड़ वाली प्रार्थना सभा होती है।
क्रिसमस पर घरों और चर्चों में सँवारी जाने वाली क्रिसमस झाँकी (या चरणी/गोशाला का दृश्य इस त्योहार की सबसे मार्मिक और लोकप्रिय परंपराओं में से एक है। यह दृश्य प्रभु यीशु के साधारण और विनम्र जन्म को दर्शाता है।
इस परंपरा की शुरुआत इस सुंदर और भावनात्मक परंपरा की शुरुआत का श्रेय एक संत को जाता है, झाँकी सजाने की शुरुआत संत फ्रांसिस ऑफ असिसी ने की थी। यह घटना 1223 ईस्वी में इटली के ग्रेसियो (Grecio) नामक एक छोटे से गाँव के पास एक गुफा में हुई थी। संत फ्रांसिस उस समय क्रिसमस के उत्सव को उसके मूल अर्थ की ओर वापस लाना चाहते थे। वह चाहते थे कि लोग उपहारों और भौतिक चीज़ों पर ध्यान देने के बजाय, उस साधारण और पवित्र क्षण को याद करें जब ईश्वर ने मनुष्य का रूप लिया था।1223 में, उन्होंने ग्रेसियो के लोगों की मदद से दुनिया की पहली ‘जीवित झाँकी’ बनाई। इसमें उन्होंने लकड़ी की मूर्तियों के बजाय असली लोगों को मैरी और जोसेफ बनाया, और असली जानवरों (जैसे बैल और गधे) को चरनी के पास रखा।उनका लक्ष्य लोगों को यह महसूस कराना था कि यीशु का जन्म कितना विनम्र और गरीबी में हुआ था।
संत फ्रांसिस द्वारा शुरू की गई यह ‘जीवित झाँकी’ की अवधारणा धीरे-धीरे एक स्थायी परंपरा बन गई। समय के साथ, असली लोगों और जानवरों के स्थान पर मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टर की छोटी मूर्तियाँ इस्तेमाल होने लगीं।आज, दुनिया भर के चर्चों और घरों में क्रिसमस के दौरान छोटी-छोटी झाँकियाँ सजाई जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से निम्न आकृतियाँ होती हैं। चरनी में शिशु यीशु, मैरी (माँ) और जोसेफ (पिता),भेड़ और पशु, चरवाहे, तीन ज्ञानी पुरुष/राजा, जो बाद में उपहार लेकर पहुंचे थे।यह झाँकी हर देखने वाले को बैथलहम की उस पवित्र रात की सादगी और दिव्यता का अनुभव कराती है।





