नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। होली को भारत में रंगों, उल्लास और आपसी भाईचारे के पर्व के रूप में मनाया जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह त्योहार पाकिस्तान में भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। वहां के हिंदू समुदाय के लिए होली सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का माध्यम भी है।
सिंध प्रांत बना होली का केंद्र
पाकिस्तान में होली का सबसे ज्यादा उत्साह सिंध प्रांत में देखने को मिलता है, जहां हिंदू समुदाय की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। यहां यह त्योहार पारंपरिक रीति-रिवाजों, रंग-गुलाल और सामुदायिक आयोजनों के साथ मनाया जाता है। अल्पसंख्यक पर्व होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन की ओर से सुरक्षा और व्यवस्था के पूरे इंतजाम किए जाते हैं, जिससे लोग बेफिक्र होकर उत्सव मना सकें।
कराची में सबसे बड़ा होली फेस्टिवल
पाकिस्तान का सबसे बड़ा होली उत्सव कराची शहर में आयोजित होता है। इसका मुख्य केंद्र ऐतिहासिक श्री स्वामीनारायण हिंदू मंदिर होता है, जहां हर साल सैकड़ों श्रद्धालु जुटते हैं। उत्सव की शुरुआत होलिका दहन से होती है, जिसके बाद रंग खेलना, भक्ति गीत, नृत्य और सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। कराची की होली की खास बात यह है कि इसमें शहर के विभिन्न इलाकों से लोग शामिल होते हैं, जिससे यह आयोजन और भी भव्य बन जाता है।
मीठी: सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
सिंध का मीठी शहर हिंदू-मुस्लिम एकता का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है। यहां हिंदू आबादी बहुसंख्यक है और होली को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्व के रूप में मनाया जाता है। खास बात यह है कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी बढ़-चढ़कर इस उत्सव में हिस्सा लेते हैं। मटकी फोड़, रंग खेल और लोकगीतों के साथ यहां की होली आपसी भाईचारे का संदेश देती है।
मुल्तान से जुड़ी होली की प्राचीन विरासत
मुल्तान में होली का ऐतिहासिक महत्व भी बताया जाता है। मान्यता है कि प्राचीन प्रहलाद पुरी मंदिर से इस पर्व की परंपरा जुड़ी रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थान भक्त प्रहलाद और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से संबंधित है। हालांकि आज मंदिर खंडहर में तब्दील हो चुका है, लेकिन होली से इसका संबंध अब भी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बना हुआ है।
अन्य शहरों में भी दिखता है रंगों का असर
कराची, मीठी और मुल्तान के अलावा लाहौर, रावलपिंडी और बलूचिस्तान के कुछ हिंदू बहुल इलाकों में भी होली मनाई जाती है। भले ही आयोजन छोटे स्तर पर होते हों, लेकिन गुलाल लगाना, नाच-गाना और मिठाइयों का आदान-प्रदान इस पर्व की आत्मा बना रहता है।




