नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। मई माह यानी ज्येष्ठ मास में आने वाली पहली एकादशी तिथि को ही अपरा एकादशी कहा जाता है। यह व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित होता है। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से जीवन के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। आइण् जानते है अपरा एकादशी के पूजा का खास महत्व, व शुभ मुहूर्त, पारण का समय, पूजा विधि सबके बारें में।
अपरा एकादशी का व्रत 23 मई को रखा जाएगा
साल में कुल 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी पुण्य, मोक्ष और आर्थिक लाभ देने वाली मानी जाती है। ऐसे में आइए जानते हैं एकादशी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पारण का समय। इस साल अपरा एकादशी की तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। क्योंकि, इसकी शुरुआत और समाप्ति की तिथि दो अलग-अलग दिनों पर हो रही है। वैदिक पंचांग के अनुसार, अपरा एकादशी तिथि की शुरुआत 22 मई को रात 1 बजे समापन 23 मई को रात 11 बजकर 30 मिनट पर खत्म होगा। ऐसे में इस बार उदया तिथि नियम के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत 23 मई को रखा जाएगा।
अपरा एकादशी 2025 शुभ योग
इस वर्ष अपरा एकादशी वैदिक ज्योतिष के अनुसार, 23 मई को आयुष्मान योग और प्रीति योग में पड़ रहा है। जो पूजा-पाठ की दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन विष्णु जी और लक्ष्मी माता की पूजा करने से साधक को विशेष कृपा प्राप्त होती है।
व्रत के बाद दान का महत्व
अपरा एकादशी का व्रत का पारण 24 मई 2025 को सुबह 5 बजकर 27 मिनट पर होगा। एकादशी व्रत करने के बाद द्वादशी तिथि पर जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा है। इस दिन दान करने से आर्थिक लाभ मिलता है। व अन्न, वस्त्र, घी, मिठाई आदि का दान करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।
अपरा एकादशी व्रत और पूजा विधि
इस दिन सुबह उठकर स्नान कर साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का ध्यान कर व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थान को साफ कर पीले कपड़े बिछाकर भगवान की मूर्ति या फोटो को रख जल, फूल, चंदन, धूप, दीप से भगवान का पूजन करें। पीले फूल, तुलसी और मिठाई का भोग लगा अंत में आरती करके प्रसाद बांटें।
अपरा एकादशी 2025 मंत्र
ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ।।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ।।
शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥




