Shaniwar Mantra: शनिदेव की कृपा से चमक जाएगी किस्मत, इन मंत्रों का करें जाप

जिस व्यक्ति पर शनि देव की बुरी दृष्टि पड़ जाए उसका पूरा समय शुरू हो जाता है। इसीलिए शनि देव की प्रकोप से बचने के लिए उनके मंत्रों का जाप करते रहना चाहिए।
Mantra of Shanidev
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नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। 4 May 2024। शनि देव जिन पर प्रसन्न होते हैं उन लोगों को हर काम में सफलता मिलती है। इन लोगों के किसी भी काम में बाधा नहीं आती है। लेकिन अगर शनि देव का प्रकोप आप पर पड़ जाए तब आपका बना बनाया काम भी बिगड़ जाता है। इसीलिए उनके इन चमत्कारी मंत्रों का जाप करके उन्हें प्रसन्न करें। शनि के मंत्रों के जाप से जीवन से हर कष्ट का भी अंत हो जाता है।

शनि देव की पूजा विधि

शनिवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और काले रंग के साफ-सुथरे कपड़े पहने। काले रंग के कपड़े अगर आपके पास ना हो तो, उसे कलर से मिलते जुलते बैगनी कलर के भी कपड़े पहन सकते हैं।आप किसी शनि मंदिर में जाकर शनि देव की पूजा करें और नीले रंग के फूल चढ़ाएं। कुश के आसान में बैठकर इन मंत्रों का जाप करें।इससे शनि देव शांत होते हैं और जीवन में सुख-संपत्ति आती है।

शनिदेव का महत्त्व

शनिवार की पूजा विशेष तौर पर न्याय के देव शनि ग्रह की कुदृष्टि से बचने के लिए की जाती है। शनि देव का रंग काला है इसलिए इस दिन काले वस्त्र पहनना शुभ होता है। काले कपड़ों और काले तिल का दान करना भी बहुत अच्छा माना जाता है। शनिदेव को बहुत घातक भी माना जाता है। इसलिए शनि देव की पूजा अर्चना बड़े ही विधि विधान से करनी चाहिए।

इन मंत्रों का करें जाप

ॐ शं शनिश्चराय नम:

ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम ।

उर्वारुक मिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात ।

ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शंयोरभिश्रवन्तु नः। ऊँ शं शनैश्चराय नमः

शनि महामंत्र - ॐ निलान्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।

छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥

शनि दोष निवारण मंत्र - ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम।

उर्वारुक मिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात।।

शनि का पौराणिक मंत्र - ऊँ ह्रिं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।

छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।

शनि का वैदिक मंत्र - ऊँ शन्नोदेवीर-भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः।

शनि गायत्री मंत्र - ऊँ भगभवाय विद्महैं मृत्युरुपाय धीमहि तन्नो शनिः प्रचोद्यात्।

ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शंयोरभिश्रवन्तु नः।

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