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Monday, March 30, 2026
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Mahalakshmi Ashtak: धन की कमी से हो गए हैं परेशान, तो रोजाना करें ‘महालक्ष्मी अष्टक’ का पाठ

वैभव लक्ष्मी का व्रत पुरुष और स्त्री दोनों कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि वैभव लक्ष्मी व्रत करने से साधक के जीवन में धन से जुड़ी परेशानियां जल्द ही दूर हो जाती हैं।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। हिंदू धर्म में शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी को समर्पित है। मां महालक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की विशेषरूप से पूजा-अर्चना की जाती है। माता लक्ष्मी की विधि -विधान से पूजा करने से कभी भी धन की कोई कमी नहीं होती है। साधक शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की श्रद्धा भाव से पूजा करते हैं। साधक मां लक्ष्मी के साथ-साथ इस दिन वैभव लक्ष्मी का भी व्रत रखते हैं। वैभव लक्ष्मी का व्रत पुरुष और स्त्री दोनों कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि वैभव लक्ष्मी व्रत करने से साधक के जीवन में धन से जुड़ी परेशानियां जल्द ही दूर हो जाती हैं। मां लक्ष्मी अपने भक्तों पर कृपा करती हैं। उनकी कृपा से आय, सुख और धन में आशा से अधिक वृद्धि हो रही है। अगर आप भी धन की देवी मां लक्ष्मी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो धन प्राप्ति के लिए रोज सुबह स्नान ध्यान के बाद महालक्ष्मी अष्टक का पाठ करें और मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करें।

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महालक्ष्मी अष्टक

नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।

शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्षि्म नमोस्तु ते॥

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि ।

सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि ।

सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।

मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।

योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे ।

महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।

परमेशि जगन्माता महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते ।

जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

फलश्रुति

महालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः ।

सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।

द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।

महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्न वरदा शुभा ॥

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