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Thursday, April 9, 2026
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कौन हैं कार्तिकेय भगवान, जानिए इनके जन्म और शक्ति के बारे में सब कुछ

भगवान कार्तिकेय हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं, जिन्हें शिव और पार्वती के पुत्र तथा देवताओं के सेनापति के रूप में जाना जाता है।

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। हिंदू धर्म ग्रंथों में भगवान शिव और माता पार्वती के दो पुत्रों का वर्णन किया गया है, जिनमें से एक हैं गणेश जी और दूसरे कार्तिकेय। हम सभी गणेश जी के जन्म की कथा और उनसे संबंधित कथाएं तो जानते हैं ही। लेकिन भगवान कार्तिकेय के बारे में कम ही लोगों को पता होगा। ऐसे में आज हम आपको कार्तिकेय जी के बारे में सब कुछ बताएंगे।

इस प्रकार हुआ कार्तिकेय भगवान जन्म

कथा के अनुसार बताया जाता है कि, जब माता सती ने अपने पिता द्वारा शिव जी का अपमान सुना, तो उन्होंने अग्निकुण्ड में अपने प्राण त्याग दिए। माता सती के जाने के बाद से ही महादेव तपस्या में लीन रहने लगे। राक्षस तारकासुर को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकती है। इस दौरान एक तारकासुर ने यह सोचकर अपना आतंक फैलाना शुरू कर दिया कि शिव जी तो तपस्या में लीन रहते हैं, ऐसे में उनका पुत्र कैसे उत्पन्न होगा।

इस बाद देवताओं ने सोचा कि किस तरह शिव जी से पार्वती का विवाह कराया जाए। दूसरी ओर पार्वती, शिव जी को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। इसके बाद शुभ मुहूर्त में शिव जी और पार्वती का विवाह हुआ। एक दिन शिव जी के तेज (ऊर्जा) से एक दिव्य अग्नि उत्पन्न हुई।

यह तेज इतना शक्तिशाली था कि कोई भी उसे संभाल नहीं पा रहा था।पहले इसे अग्नि देव ने धारण किया। फिर इसे गंगा जी को सौंपा गया गंगा जी इस तेज को लेकर एक स्थान पर गईं, जिसे सरवन (सरवन वन) कहा जाता है। वहां उस दिव्य तेज से छह बालकों का जन्म हुआ।इन छह बच्चों की देखभाल कृत्तिका 6 देवियाँ ने की।बाद में पार्वती जी ने उन सभी छह बच्चों को एक साथ मिलाकर एक ही बालक बना दिया और बालक का नाम कार्तिकेय रखा गया।

देवताओं के बने सेनापति

बड़े होकर कार्तिकेय जी को देवताओं का सेनापति बनाया गया।कार्तिकेय तारकासुर का वध करते हैं और सभी देवताओं के अनुरोध पर कार्तिकेय जी देवताओं के सेनापति पद को स्वीकार करते हैं। तभी से कार्तिकेय जी को देवताओं के सेनापति के रूप में पूजा जाता है।

भगवान कार्तिकेय का वाहन

भगवान कार्तिकेय का वाहन है मोर उसे को अहंकार और बुराई पर विजय का प्रतीक माना जाता है। दक्षिण भारत में इन्हें मुरुगन के रूप में बहुत पूजा जाता है वो युवा, वीर और तेजस्वी देवता माने जाते हैं युद्ध और विजय के देवता भी उन्हें कहा जाता है।

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