नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। हिंदू शास्त्रों में भगवान ब्रह्म देव को सृष्टि का रचयिता कहा गया है। ब्रह्म देव भगवान विष्णु व महेश के साथ त्रिदेवों में शामिल हैं।ब्रह्मा जी की विशेष पहचान चार मुखों और चार हाथों से होती है। उनके हाथों में आमतौर पर पुस्तक, माला, कमंडल और जलाशय का बिंब होता है, जो ज्ञान, साधना और सृजन शक्ति का प्रतीक हैं। बहुत कम लोग ये जानते हैं कि सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्म देव की उत्पत्ति कैसे हुई थी तो चलिए जानते हैं।
कौन हैं ब्रह्म देव?
पौराणिक कथा के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति से पहले ये पूरा संसार जल में डूबा हुआ था। उस समय एकमात्र भगवान नारायण देव शेष शैय्या पर लेटे हुए थे। जब सृष्टि की रचना का समय आया तो भगवान नारायण की नाभि से एक प्रकाशमान कमल प्रकट हुआ। उसी कमल से वेद मूर्ति ब्रह्माजी प्रकट हुए। भगवान नारायण ने इसके बाद चार मुख वाले ब्रह्म जी को अपने भागवत तत्व का उपदेश चार श्लोकों में दिया, जिसे चतु:श्लोकी भागवत कहा जाता है। ताकि उन्हें अलग-अलग कल्पों में सृष्टि की रचना करते रहने पर भी कभी ना हो।
पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने मनुष्यों, देवताओं, ऋषियों और असुरों का निर्माण किया और उनके लिए नियम और धर्म निर्धारित किए। भगवान ब्रह्मा ने न केवल सृष्टि की शुरुआत की बल्कि उसकी व्यवस्था और संचालन का भी मार्गदर्शन किया। उनका काम केवल बनाना ही नहीं, बल्कि सृष्टि को संतुलित रखना भी है।ब्रह्मा जी सृष्टि के निर्माता हैं, जबकि भगवान विष्णु पालनहार और भगवान शिव संहारक माने जाते हैं। इस त्रिदेव के माध्यम से संसार का चक्र चलता है।
अवतार और मंदिर
हिंदू धर्म में ब्रह्मा का कोई प्रमुख अवतार नहीं माना जाता, क्योंकि वे सृष्टि के निर्माता हैं और उनका मुख्य कर्तव्य संसार की रचना करना है। भारत में ब्रह्मा के मंदिर बहुत कम हैं। प्रमुख मंदिरों में पुष्कर (राजस्थान) का ब्रह्मा मंदिर सबसे प्रसिद्ध है। यहां विशेष रूप से कार्तिक मास और पुष्कर मेले के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
परिवार
भगवान ब्रह्मा की पत्नी सरस्वती देवी हैं, जो ज्ञान, संगीत और कला की देवी मानी जाती हैं। उनके दो प्रमुख पुत्र माने जाते हैं मारिच और आमर्ष। ब्रह्मा जी की कुल संताने और उनकी महिमा पुराणों में विस्तृत रूप से वर्णित है।




