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Friday, March 20, 2026
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क्‍यों बिहार की सत्ता का संतुलन हमेशा नीतीश कुमार पर टिका रहता है ? विशेषज्ञों से समझें इसके मायने

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक ऐसा नाम बन गए हैं जिन पर हर किसी की निगाहें रहती है। फिर चाहे वो महागठबंधन हो या फिर बीजेपी, क्योंकि बिहार की सत्ता की चाबी नीतीश कुमार के पास ही रही है।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । बिहार की राजनीति एक बार फिर हलचल में है। अटकलें तेज हैं कि मुख्यमंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार महागठबंधन से नाता तोड़कर फिर से एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का दामन थाम सकते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स तो इस हद तक दावा कर रही हैं कि भाजपा के साथ मिलकर नई सरकार के गठन की तैयारी भी चल रही है। हालांकि जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने इन सभी कयासों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि पार्टी अब भी महागठबंधन का हिस्सा है और इसमें किसी तरह की भ्रम की स्थिति नहीं है। उन्होंने साफ कहा, “हमें ऐसी किसी राजनीतिक बदलाव की जानकारी नहीं है। हमारे नेता अपने काम में लगे हुए हैं और पूरी तरह व्यस्त हैं।”बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच नीतीश कुमार एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्यों बिहार की सत्ता का संतुलन हमेशा उनके इर्द-गिर्द घूमता रहता है?

नीतीश कुमार की अगली राजनीतिक चाल क्या होगी? 

जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने कहा कि, “हमारे नेता विपक्षी एकता के सूत्रधार रहे हैं। इंडिया गठबंधन का गठन उन्हीं की पहल पर हुआ। उन्होंने हमेशा सीटों के बंटवारे में तेजी लाने की बात की है। अब इस पर कांग्रेस को आत्मचिंतन करना चाहिए।” दूसरी ओर, भाजपा की वरिष्ठ नेता रेणु देवी ने इन अटकलों पर अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा, “इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है। फिलहाल हम लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं।”

गौर करने वाली बात यह भी है कि खुद नीतीश कुमार पहले यह साफ कर चुके हैं कि वे एनडीए में वापसी नहीं करेंगे, और भाजपा भी कह चुकी है कि नीतीश के लिए एनडीए में कोई जगह नहीं है। इस हफ्ते एक और बयान ने राजनीतिक हलचल को और हवा दी। कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने बिना किसी का नाम लिए कहा, “कर्पूरी ठाकुर कभी अपने परिवार के लिए नहीं सोचते थे, लेकिन आज कुछ लोग केवल अपने परिवार को आगे बढ़ाने में लगे हैं।” इस टिप्पणी को राजद और खासकर तेजस्वी यादव पर इशारा माना जा रहा है, जिससे एक बार फिर यह अटकलें ज़ोर पकड़ने लगी हैं कि नीतीश महागठबंधन से बाहर निकल सकते हैं। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की अगली चाल पर सबकी निगाहें टिकी हैं, क्या वे एक बार फिर समीकरण बदलेंगे, या विपक्षी एकता को बचाए रखने की कोशिश करेंगे?

परिस्थितियों का खेल या पूर्वनियोजित योजना

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का सफर लगातार उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2013 में उन्होंने बीजेपी से नाता तोड़ते हुए एनडीए को अलविदा कहा था, और 2015 के विधानसभा चुनावों से पहले आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया। लेकिन 2017 में उन्होंने अचानक उस गठबंधन से भी किनारा कर लिया और दोबारा एनडीए में लौट आए। फिर 2022 में उन्होंने एक बार फिर एनडीए से अलग होकर महागठबंधन का हिस्सा बने। अब, एक बार फिर उनकी एनडीए में वापसी की अटकलें तेज़ हैं। इतनी बार सियासी पलटी मारने के चलते नीतीश कुमार को मीडिया के कुछ हिस्सों में ‘पाला बदलने वाले नेता’ तक कहा गया है। 

पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर का मानना है कि, “नीतीश कुमार सत्ता केंद्रित राजनीति करते हैं। वे अप्रत्याशित हैं, लेकिन यह अच्छी तरह समझते हैं कि अगर सत्ता उनके पास रहेगी तो बाकी सब साध्य हो जाएगा।” वहीं, वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं कि, “अगर ये खबरें सच हैं, तो ये बहुत अधिक ‘आना-जाना’ हो रहा है। लालू यादव के समर्थक कहते हैं कि लालू जी का एक स्पष्ट स्टैंड रहा है। नीतीश जी को देखिए डेढ़ साल पहले ही आप लौटे हैं, शिक्षकों की बहाली करवाई, और अब फिर विचार बदल रहे हैं? सवाल यह है कि क्या कर्पूरी ठाकुर वाली टिप्पणी सिर्फ बहाना थी, या फिर सब पहले से तय था?”

दरअसल, यह चर्चा भी लंबे समय से चल रही थी कि ‘इंडिया’ गठबंधन में नीतीश कुमार को पीएम चेहरा न बनाए जाने से वे नाराज़ थे। इसके अलावा सीट बंटवारे को लेकर सहयोगी दलों के बीच धीमी प्रगति भी उनकी असहमति का कारण मानी जा रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह सब अचानक हो रहा है या यह एक रणनीति का हिस्सा था, जिसकी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी।

बिहार में ‘नीतीश फैक्टर’ : न तो पूरी तरह भाजपा के और न ही पूरी तरह विपक्ष के

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक ऐसी शख़्सियत हैं, जिन्होंने समय के साथ खुद को हर गठबंधन के लिए अपरिहार्य बना लिया है, चाहे वह भारतीय जनता पार्टी हो या राष्ट्रीय जनता दल। उनके इसी राजनीतिक लचीलापन और रणनीतिक संतुलन ने उन्हें बिहार की सत्ता की धुरी बनाए रखा है। 

हाल ही में राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ शुरू होने से पहले जेडीयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने बीबीसी से बातचीत में चिंता जताई कि राहुल की दिल्ली में गैरहाज़िरी से ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे की बातचीत प्रभावित हो सकती है। इसके मद्देनजर नीतीश कुमार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर श्रद्धांजलि देते हुए वंशवाद पर हमला बोला, जिसे राजनीतिक हलकों में राजद और लालू यादव के परिवार पर निशाना माना गया, हालांकि जेडीयू ने इससे इनकार किया। लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक उपयोगिता साबित की हो। बीते दशक में वे बार-बार एक गठबंधन से दूसरे में जाते रहे हैं] हर बार नई भूमिका के साथ। कभी भाजपा के लिए विश्वसनीय चेहरा, तो कभी महागठबंधन के संतुलनकारी सूत्रधार।

पटना स्थित राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर का मानना है कि, “बिहार की राजनीति ऐसी है कि कोई भी दल अकेले सरकार नहीं बना सकता। नीतीश कुमार ने हमेशा दोनों ओर अपने विकल्प खुले रखे हैं, राजद के लिए भी और भाजपा के लिए भी। जब एक पक्ष के साथ मुश्किल होती है, तो वे दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं।”

दिवाकर आगे जोड़ते हैं कि नीतीश कुमार के पास कोई बहुत बड़ा वोट बैंक नहीं है, लेकिन वे जिस भी गठबंधन में शामिल होते हैं, वहां उनका रणनीतिक महत्व तुरंत बढ़ जाता है। वे कहते हैं “जातिगत राजनीति बिहार में इतनी गहरी हो चुकी है कि जाति-आधारित जनगणना के बाद हर समुदाय को अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहिए। ऐसे में नीतीश कुमार जैसे नेता, जो सामाजिक समीकरणों को समझते हैं, बेहद प्रभावशाली हो जाते हैं।” ‘नीतीश फैक्टर’ यही है, न तो पूरी तरह भाजपा के और न ही पूरी तरह विपक्ष के। लेकिन जब भी सत्ता की बिसात बिछती है, उनकी भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

नीतीश कुमार: ‘सुशासन बाबू’ से सत्ता के संतुलन तक

नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा 1974 के छात्र आंदोलन से शुरू हुई, जब वे जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उभरती जनक्रांति का हिस्सा बने। उस दौर में उन्होंने लालू प्रसाद यादव और जॉर्ज फर्नांडीस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। 1990 में लालू यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बने, तब नीतीश उनके भरोसेमंद सहयोगी थे। लेकिन जल्द ही दोनों के रास्ते अलग हो गए और 1994 में नीतीश ने फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी की नींव रखी।

1995 से नीतीश कुमार ने लालू यादव के शासन को ‘जंगलराज’ कहकर निशाना बनाना शुरू किया। इसी मुद्दे को आधार बनाकर उन्होंने विपक्ष को संगठित किया और 2000 व 2005 के चुनावों में यही नैरेटिव प्रमुख रहा। 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में पहली बार एनडीए सरकार बनी और यहीं से शुरू हुआ उनका ‘सुशासन बाबू’ बनने का सफर।

सुशासन की छवि और शुरुआती लोकप्रियता

2005 से 2010 का दौर नीतीश कुमार के लिए निर्णायक रहा। इस अवधि में उन्होंने कानून-व्यवस्था सुधार, सड़कों का विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार जैसे ठोस कार्य किए, जिसने उन्हें एक ईमानदार और सक्षम प्रशासक की छवि दिलाई। वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद के अनुसार, “उनके शुरुआती कार्यों ने उन्हें सभी वर्गों में स्वीकार्य बनाया। वो चाहे कोई जाति हो, पार्टी हो या विचारधारा, नीतीश हमेशा 12–13 प्रतिशत का कोर वोट हासिल करते रहे हैं। वामपंथी सोच रखने वाले भी उन्हें विकल्प मानते थे।”

सामाजिक समीकरणों का मास्टर स्ट्रोक

नीतीश कुमार ने न केवल प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान दिया, बल्कि सामाजिक न्याय को भी अपनी राजनीति का केंद्रीय तत्व बनाया। उन्होंने अत्यंत पिछड़े वर्गों और दलित समुदायों को एकजुट कर एक मजबूत सामाजिक आधार तैयार किया। 2007 में उन्होंने ‘महादलित’ वर्ग की घोषणा की। यह उन दलित जातियों का समूह था जो अब तक सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे अधिक वंचित थे। इसके तहत विशेष सरकारी योजनाएं चलाई गईं। इस कदम ने उन्हें सामाजिक न्याय के एक मजबूत स्तंभ के रूप में स्थापित किया। नीतीश स्वयं कुर्मी जाति से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण ओबीसी समूह है। उनके नेतृत्व में यह जातिगत गठजोड़ और भी मजबूत हुआ।

बिहार की राजनीति में गहमागहमी तेज

पिछले कुछ हफ्तों में बिहार की राजनीति में गहमागहमी तेज हो गई है। मीडिया में बार-बार यह खबरें सामने आईं कि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (यूनाइटेड) के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। विश्लेषक डीएम दिवाकर का मानना है कि इस खींचतान की एक बड़ी वजह मुख्यमंत्री पद को लेकर राजद का बढ़ता दबाव है। दिवाकर बताते हैं “राजद चाहता था कि नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर रुख करें और बिहार की कमान तेजस्वी यादव को सौंप दें।”

सीटों के समीकरण और ‘इंडिया’ गठबंधन की कमजोरी

नीतीश कुमार की नाराजगी की एक और वजह ‘इंडिया’ गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही धीमी प्रक्रिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने भाजपा के साथ मिलकर 17 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन इस बार, बदले राजनीतिक समीकरणों के चलते जेडीयू को कम सीटों पर लड़ने का सुझाव दिया गया, जो पार्टी के लिए स्वीकार करना कठिन था। इस बीच, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे गठबंधन सहयोगियों ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। जिससे यह संदेश गया कि विपक्षी एकता में गहरी दरारें हैं। नीतीश कुमार जैसे नेता के लिए यह स्थिति असहज थी। विपक्ष के पास नेतृत्व को लेकर स्पष्टता नहीं थी, जबकि भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के साथ मजबूती से डटी हुई है।

भाजपा के लिए भी जरूरत हैं नीतीश

दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के लिए भी नीतीश कुमार एक ज़रूरी सहयोगी हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद का कहना है:- “भाजपा के पास बिहार में कोई मजबूत चेहरा नहीं है। यूपी में कल्याण सिंह, एमपी में उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता थे। लेकिन बिहार में भाजपा के पास वैसा कोई प्रभावशाली चेहरा नहीं रहा।” इसलिए, नीतीश कुमार का साथ भाजपा के लिए सिर्फ एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत बन जाता है, खासकर तब, जब लोकसभा चुनाव सिर पर हों और सत्ता में वापसी के लिए हर सीट अहम हो। डीएम दिवाकर भी मानते हैं कि अगर भाजपा बिहार में सरकार बना लेती है, तो इसका सीधा फायदा उसे लोकसभा चुनाव में मिल सकता है, क्योंकि तब चुनाव उसी के शासनकाल में होंगे।

क्या बिहार में ‘राम मंदिर लहर’ हैं ?

22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह ने पूरे देश में धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को झकझोर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति वाले इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के साथ देशभर में दीयों की रोशनी, हवन और विशेष पूजन का माहौल बना, एक तरह से इसे एक ‘धार्मिक लहर’ की तरह देखा गया। राजनीतिक विश्लेषक पवन वर्मा का कहना है कि देश के लगभग हर कोने उत्तर, दक्षिण, पूर्व या पश्चिम में राम मंदिर कार्यक्रम का असर दिखा। लेकिन क्या बिहार भी इस लहर से उतना ही प्रभावित हुआ, जितनी उम्मीद भाजपा को थी।

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद इस पर सवाल उठाते हैं “अगर राम मंदिर का असर इतना गहरा होता, तो भाजपा को नीतीश कुमार जैसे नेता की फिर से ज़रूरत क्यों पड़ती? क्या ये इस बात का संकेत नहीं है कि मंदिर मुद्दे का बिहार में वह असर नहीं पड़ा, जिसकी उम्मीद थी?” राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर इस बात से सहमति जताते हैं कि बिहार में धार्मिक मुद्दे, खासकर मंदिर जैसे विषय, अपने आप में निर्णायक भूमिका नहीं निभाते। वे कहते हैं “श्रीराम का मंदिर बन गया है, लेकिन उसका असर आगे कितना टिकेगा ये तय नहीं है।” उनका यह भी कहना है कि “बिहार की राजनीति में ‘मंदिर’ स्वतंत्र रूप से काम नहीं करता। यहां सामाजिक समीकरण यानी मंडल (जातीय राजनीति) और कमंडल (धार्मिक राजनीति) दोनों को साथ लेकर चलना पड़ता है।”

दिवाकर यह भी बताते हैं कि भाजपा ने बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए ‘पिछड़ा कार्ड’ खेलने की कोशिश की है, ताकि वह केवल सांप्रदायिक भावनाओं के भरोसे न रहे।” वे कहते हैं “राजनीति अब कैडर, विचारधारा या स्थायित्व पर नहीं, बल्कि अवसरवाद, ताक़त और फाइनेंस पर चल रही है। संसदीय राजनीति अब एक ऐसी बिसात बन गई है जहां दरवाज़े कभी पूरी तरह बंद नहीं होते।”

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