नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी जोरों पर है, जो अक्टूबर-नवंबर में संपन्न होंगे। इसी चुनावी माहौल में हम राज्य की राजनीति, प्रमुख घटनाओं और महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरों पर प्रकाश डालेंगे। इस श्रृंखला का हिस्सा ‘सीट का समीकरण’ है, जिसमें आज हम राघोपुर विधानसभा क्षेत्र पर नजर डालेंगे। राघोपुर की चुनावी पृष्ठभूमि कैसी रही है? कौन-कौन से नेता यहां से विधानसभा तक पहुंचे हैं? इस सीट ने लालू यादव और उनके परिवार के राजनीतिक प्रभुत्व को कैसे मजबूती दी? पिछली बार यहां का चुनाव किस प्रकार संपन्न हुआ था? और इस बार इस सीट पर राजनीतिक माहौल कैसा दिख रहा है? आइए, इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से समझते हैं।
राघोपुर विधानसभा क्षेत्र का परिचय
बिहार के कुल 38 जिलों में से एक महत्वपूर्ण जिला है वैशाली, जिसका प्रशासनिक मुख्यालय हाजीपुर में स्थित है। वैशाली जिला तीन अनुमंडलों और 16 ब्लॉकों में विभाजित है। इस जिले में आठ विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें हाजीपुर, लालगंज, वैशाली, महुआ, राजापाकर, महनार, पातेपुर और राघोपुर शामिल हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में पहला चुनाव 1951-52 में हुआ था, जिसमें लोकसभा के साथ-साथ सभी राज्यों की विधानसभा के लिए भी मतदान कराया गया। इसी चुनाव में बिहार की राघोपुर विधानसभा सीट भी अस्तित्व में थी और तब से लेकर आज तक यह क्षेत्र राजनीतिक महत्व रखता आ रहा है।
1951 : पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत
1951 में बिहार विधानसभा के पहले चुनाव हुए, जिनमें कुल 276 सीटों में से 24 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थीं। इस चुनाव में कुल 1594 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। अमौर विधानसभा क्षेत्र में एकमात्र उम्मीदवार ने ही चुनाव लड़ा था, जहां कांग्रेस के मोहम्मद ताहिर निर्विरोध विजयी हुए। वहीं, नवादा सह हसुआ सीट सबसे प्रतिस्पर्धात्मक रही, जहां 18 उम्मीदवारों ने भाग लिया।
अब बात करें राघोपुर विधानसभा सीट की। 1951 के चुनाव में यहां कुल चार उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे। इस चुनाव में कांग्रेस के हरिबंश नारायण सिंह ने बाज़ी मारी। उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के कृष्ण देव नारायण रॉय को 2,693 वोटों के अंतर से हराया था। 1957 के विधानसभा चुनाव में भी हरिबंश नारायण ने एक बार फिर जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी हरदेव प्रसाद सिन्हा को पराजित किया और जीत का अंतर बढ़कर 8,259 वोट हो गया। 1957 के चुनाव में भी राघोपुर सीट से कुल चार उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे 1951 में।
1962: राघोपुर सीट से कांग्रेस का पलटा झटका
1962 के बिहार विधानसभा चुनाव में राघोपुर सीट कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुई। इस बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और सोशलिस्ट पार्टी के देवेन्द्र सिन्हा ने चुनाव जीता। उन्होंने कांग्रेस के हरिबंश नारायण को हराकर उनकी लगातार जीत का सिलसिला तोड़ दिया। इस चुनाव में राघोपुर नाम की बिहार में दो विधानसभा सीटें थीं। दूसरी राघोपुर सीट से कांग्रेस के राजेंद्र मिश्रा विजयी हुए थे।
1967 : हरिबंश नारायण सिंह की पार्टी बदलकर वापसी
1967 के बिहार विधानसभा चुनाव में राघोपुर सीट पर हरिबंश नारायण सिंह ने एक बार फिर जीत हासिल की, लेकिन इस बार वे जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में मैदान में थे। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार आर. बी. रॉय को हराया। वहीं, राघोपुर नाम की दूसरी सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के ए. गोइत विजयी रहे।
1967 का चुनाव बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव लेकर आया। 318 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस 128 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से दूर रही। इसके परिणामस्वरूप सरकार विपक्षी दलों के गठबंधन की बनी। जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा, जिन्होंने केवल 13 सीटें जीती थीं, राज्य के मुख्यमंत्री बने, जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कर्पूरी ठाकुर उप-मुख्यमंत्री बने।
हालांकि, यह सरकार लंबे समय तक टिक नहीं पाई। केवल 329 दिन बाद नई सरकार बनी, जिसमें एसएसपी के सतीश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार महज तीन दिन चली। इसी दौरान बीपी मंडल ने अपने विधायकों के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। चार दिन बाद मंडल मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार भी केवल 50 दिन चली।
राज्य में राजनीतिक उठापटक जारी रही, जिसमें कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री भी मुख्यमंत्री बने, लेकिन वे भी केवल 99 दिन पद पर टिक सके। अंततः जून 1968 में बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। इसके बाद नए चुनाव हुए, जो 1969 में संपन्न हुए। अब, चुनाव परिणामों की चर्चा करने से पहले, चलिए फिर से राघोपुर सीट की ओर लौटते हैं।
1969: कांग्रेस के रामवृक्ष राय ने राघोपुर सीट पर जीती बाजी
1969 के विधानसभा चुनाव में राघोपुर से कांग्रेस के रामवृक्ष राय ने जीत हासिल की। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बाबूलाल शास्त्री को पराजित किया। इस चुनाव में राघोपुर नाम की दूसरी सीट से भी कांग्रेस के वैद्यनाथ मेहता विजयी रहे। राज्य में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, जिसके कारण सरकार ज्यादा समय तक टिक नहीं सकी। इसी कारण 1972 में फिर से चुनाव कराए गए।
1972 के चुनाव में राघोपुर सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बाबूलाल शास्त्री ने जीत दर्ज की। उन्होंने भारतीय जन संघ के हरिबंश नारायण सिंह को हराया। बाबूलाल शास्त्री को 1969 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन 1972 में उन्होंने वापसी की। वहीं, राघोपुर की दूसरी सीट से कांग्रेस के अमरेनिसा मिश्रा ने चुनाव जीता।
1977: आपातकाल के बाद जनता पार्टी की जोरदार जीत
देश में आपातकाल के खत्म होने के बाद 1977 में लोकसभा और बिहार विधानसभा दोनों के चुनाव हुए। इस चुनाव में बिहार की 324 विधानसभा सीटों में से 214 सीटें जनता पार्टी ने अपने नाम कीं। राघोपुर नाम की दोनों विधानसभा सीटों पर भी जनता पार्टी ने जीत हासिल की। एक सीट से जनता पार्टी के बाबू लाल शास्त्री ने कांग्रेस के कन्हाई पी. सिंह को पराजित किया। वहीं, दूसरी सीट से असेसर गोइत विजयी रहे।
उदय नारायण राय की राघोपुर में तीन चुनावों की हैट्रिक
1980, 1985 और 1990 के विधानसभा चुनावों में राघोपुर से उदय नारायण राय लगातार तीन बार विजयी रहे। हालांकि हर बार उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व किया। 1980 में उदय नारायण राय जनता पार्टी (सेक्युलर) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और कांग्रेस (इंदिरा) के राम जयपाल सिंह यादव को हराया। 1985 में वे लोकदल के टिकट पर चुनाव में उतरे और जनता पार्टी के हरिहर प्रसाद सिंह को मात दी।
1990 के चुनाव में उन्होंने जनता दल के प्रत्याशी के तौर पर निर्दलीय उम्मीदवार हरिहर प्रसाद सिंह को पराजित किया। इस चुनाव के बाद बिहार में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी और एक ही कार्यकाल में मुख्यमंत्री बदलने का दौर थमा। उदय नारायण राय को लालू सरकार में मंत्री के रूप में भी स्थान मिला। पांच साल बाद जब फिर से चुनाव हुए, तब उदय नारायण ने लालू यादव के लिए राघोपुर सीट छोड़ दी। यहीं से राघोपुर विधानसभा और लालू परिवार के बीच गहरा राजनीतिक रिश्ता शुरू हुआ।
लालू यादव ने दो सीटों से चुनाव लड़कर दोनों पर जीत हासिल की
1995 के विधानसभा चुनाव में उस वक्त के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने एक नहीं बल्कि दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा। इनमें पटना जिले की दानापुर और राघोपुर सीट शामिल थीं। दोनों जगहों से उन्होंने विजयी होकर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। अंततः उन्होंने राघोपुर सीट को अपने पास रखा और यहां से जीतकर बिहार के मुख्यमंत्री पद पर फिर से काबिज हुए। लेकिन इस कार्यकाल को पूरा करना उनके लिए संभव नहीं था। 1997 में चारा घोटाले के आरोपों के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इस बीच उनकी पार्टी भी टूट गई। इसके बाद लालू यादव ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का गठन किया और उनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री बनीं।
2000 : जेल में होने के बावजूद राघोपुर सीट पर बरकरार रहा लालू का दबदबा
2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में राघोपुर सीट से लालू प्रसाद यादव ने फिर से जीत हासिल की। उन्होंने जदयू के विष्णुदेव राय को पराजित किया। चुनाव जीतने के बाद राबड़ी देवी दोबारा बिहार की मुख्यमंत्री बनीं। लालू प्रसाद यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी के लिए यह सीट खाली कर दी। इसके बाद हुए उपचुनाव में राबड़ी देवी ने राघोपुर से जीत दर्ज कर विधानसभा में प्रवेश किया। इससे पहले, जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं, तब उन्हें विधान परिषद भेजा गया था।
2005: नौ महीने में दो बार चुनाव, दोनों में राघोपुर से राबड़ी देवी की जीत
2005 में बिहार में पहली बार एक ही साल में दो विधानसभा चुनाव हुए फरवरी और अक्टूबर में। फरवरी के चुनाव में राघोपुर से राजद की राबड़ी देवी ने लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के राजीव रंजन को हराया। छह महीने बाद अक्टूबर में हुए चुनाव में भी राबड़ी देवी ने अपनी जीत दोहराई और इस बार जदयू के सतीश कुमार को परास्त किया। हालांकि, अक्टूबर के चुनाव में राजद को कुल मिलाकर हार का सामना करना पड़ा और राबड़ी देवी सत्ता से बाहर हो गईं।
2010: राघोपुर में पहली बार लालू परिवार को करना पड़ा हार का सामना
2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में राघोपुर सीट से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के सतीश कुमार ने जीत हासिल की। सतीश कुमार ने 2005 में हुई अपनी हार का बदला लेते हुए इस बार राघोपुर से राजद की राबड़ी देवी को 13,006 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में सतीश कुमार को कुल 64,222 वोट मिले, जबकि राबड़ी देवी को 51,216 वोट ही मिले। यह राघोपुर में लालू परिवार की पहली हार थी।
2015 : तेजस्वी प्रसाद यादव ने राघोपुर से राजनीतिक सफर की शुरुआत की
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने अपनी पारंपरिक राघोपुर सीट पर वापसी की। इस बार लालू यादव के बेटे तेजस्वी प्रसाद यादव ने इस सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। तेजस्वी ने भाजपा के उम्मीदवार सतीश कुमार को 22,733 वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस जीत के साथ ही तेजस्वी यादव ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और इसके बाद राज्य सरकार में वे उप मुख्यमंत्री (डिप्टी सीएम) भी बने।
2020: तेजस्वी यादव ने राघोपुर से दूसरी बार जीत दर्ज की
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में राघोपुर सीट से राजद की जीत जारी रही। तेजस्वी प्रसाद यादव ने एक बार फिर इस सीट पर कब्जा किया और भाजपा के सतीश कुमार को करारी हार दी। इस बार तेजस्वी यादव ने सतीश कुमार को 38,174 वोटों के बड़े अंतर से हराया, जिससे उनकी जीत और भी मजबूत हुई।
पार्टी के नजरिए से राघोपुर क्षेत्र का चुनावी इतिहास
राघोपुर विधानसभा सीट पर अब तक कुल 19 चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 1998 और 2000 के उप-चुनाव भी शामिल हैं। इन चुनावों में राजद ने सबसे अधिक, यानी सात बार जीत दर्ज की है। कांग्रेस को तीन बार जीत मिली, लेकिन वह 1969 के बाद से इस सीट पर विजयी नहीं रही। इसके अलावा जनता दल ने दो बार, जबकि जनता पार्टी (सेक्युलर), जनता पार्टी, जनसंघ, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, लोकदल और जदयू को एक-एक बार जीत मिली है। पिछले आठ चुनावों में से सात बार राघोपुर पर राजद का दबदबा रहा है। वहीं, भाजपा अब तक इस सीट पर अपना खाता भी नहीं खोल पाई है।
जातीय समीकरण क्या कहते हैं?
राघोपुर सीट को लालू परिवार का मजबूत गढ़ माना जाता है, जहां करीब 30% यादव वोटर हैं। इसके साथ ही यहां भूमिहार और पासवान समुदाय के मतदाताओं की भी अच्छी संख्या मौजूद है। यही जातीय विविधता इस सीट की राजनीतिक पहचान बनाती है।
सीट की खासियत
1995 के बाद से यह सीट लालू परिवार की पारंपरिक सीट रही है। 2010 के चुनाव में ही राबड़ी देवी को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा है, जबकि बाकी सभी चुनावों में इस परिवार का दबदबा रहा है।





