नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, राजनीतिक हलचलें तेज होती जा रही हैं। इसी क्रम में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी एक बार फिर बिहार दौरे पर आ रहे हैं। यह उनका बीते पांच महीने में चौथा दौरा होगा, जो 15 मई को संभावित बताया जा रहा है। राहुल गांधी का यह दौरा सिर्फ दौरा नहीं, बल्कि कांग्रेस की चुनावी रणनीति और महागठबंधन में अपनी मजबूत दावेदारी का संदेश भी है।
बार-बार के दौरे से कांग्रेस के इरादे साफ
राहुल गांधी इससे पहले जनवरी, फरवरी और अप्रैल में भी बिहार आ चुके हैं। वे कभी संविधान बचाओ सम्मेलन में शामिल होते हैं तो कभी कन्हैया कुमार की पदयात्रा में हिस्सा लेते हैं। ये सभी यात्राएं चुनावी लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही हैं। बताया जा रहा है कि इस बार राहुल गया में पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे और संगठन को चुनावी मोड में लाने की रणनीति तय करेंगे।
सीटों की साझेदारी बनी टकराव की वजह?
महागठबंधन में इस बार सीटों के बंटवारे को लेकर अंदरखाने खींचतान की खबरें आ रही हैं। पिछली बार कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 19 सीटें जीती थीं। इस बार कांग्रेस फिर से 70 सीटें मांग रही है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक राजद और अन्य दल 55–60 सीटों की पेशकश कर रहे हैं। कांग्रेस इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रही। राहुल गांधी की सक्रियता को इसी दबाव रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
संगठन में बदलाव से नया संदेश
कांग्रेस ने हाल में बिहार संगठन में कई बड़े बदलाव किए हैं। सवर्ण नेता अखिलेश सिंह की जगह दलित नेता राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। इसके साथ ही कांग्रेस ने सभी 40 जिलों में जिला अध्यक्ष बदल दिए हैं। इससे साफ है कि पार्टी सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोट बैंक पर फोकस कर रही है।
NDA से मुकाबले की तैयारी
दूसरी ओर, एनडीए भी चुनावी मोड में आ चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य बड़े नेता बिहार में रैलियां कर चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस और महागठबंधन के लिए भी अब पूरी ताकत झोंकना जरूरी हो गया है। तेजस्वी यादव लगातार बिहार में सक्रिय हैं और अब राहुल गांधी भी फुल मोड में नजर आ रहे हैं। राहुल गांधी की बिहार यात्राओं का सिलसिला दिखाता है कि कांग्रेस इस बार बिहार विधानसभा चुनाव को हल्के में नहीं ले रही। सीटों की साझेदारी से लेकर संगठन के स्तर तक कांग्रेस खुद को मज़बूत करने में जुटी है। अब देखना होगा कि महागठबंधन इस रणनीति को कैसे साधता है और क्या कांग्रेस को उसके मुताबिक सीटें मिलती हैं या नहीं।





