नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। दीपक प्रकाश को बिना चुनाव लड़े मंत्री बनाया गया है। उनके पिता उपेंद्र कुशवाहा के पक्ष में यह कदम उनकी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने की रणनीति मानी जा रही है। नियम के अनुसार, मंत्री बनने के 6 महीनों के भीतर उन्हें विधायक या विधान परिषद् सदस्य बनना होगा।
क्यों उठ रहा है सवाल “कौन देगा कुर्बानी”?
इस बार मंत्री पद के लिए लागू नियम के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति को मंत्री बनाया जाता है और वह सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर विधायक / विधान परिषद् सदस्य बनना जरूरी है। राजनीतिक दल (भारत) (RLM) के कोटे से यह पद मिला है, लेकिन सवाल ये है कि विधायक/विधान परिषद् सीट किस दल के कोटे से दी जाएगी। JDU या भारतीय जनता पार्टी (BJP)? JDU के कोटे से सीट देना आसान नहीं माना जा रहा, इसलिए राजनीतिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि BJP अपने कोटे से सीट देना चुनेगी।
कैसा है वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य?
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLM ने इस बार एनडीए के तहत कुछ सीटें जीती हैं और इस तरह मंत्री-पद पाने का मौका मिला है। मंत्री बनते समय दीपक प्रकाश की सक्रिय दौड़ इतनी नहीं रही है — उन्होंने हाल ही में विदेश से पढ़ाई की है, फिर राजनीति में आए। परिवार में राजनीतिक पृष्ठभूमि मज़बूत है: पिता उपेंद्र कुशवाहा, मां स्नेहलता कुशवाहा विधायक।
क्या है आगे का कदम?
अब ध्यान इस बात पर होगा कि कौन सी सीट खाली होगी और उसे किस दल के कोटे में रखा जाएगा ताकि दीपक प्रकाश को छह महीने के भीतर सदन सदस्य बनाया जा सके। यदि प्रदेश में विधायक या विधान परिषद् सदस्य की सीट किसी दल के कोटे से खाली होती है, तो रणनीति के मुताबिक उस दल को कुर्बानी देना पड़ सकती है। इसके बाद राजनीति में यह संकेत भेजा जाएगा कि RLM के साथ संबंध कितने प्रगाढ़ हैं और एनडीए के भीतर भागीदारी किस स्तर की है। इस पूरे विषय में केवल एक पद नहीं बल्कि सत्ता-संतुलन, दल-भागीदारी और जात-राजनीति के कई आयाम जुड़े हैं। दीपक प्रकाश का मंत्री बनना अकेला मामला नहीं यह RLM-एनडीए-जात-समान्य समीकरण का प्रतिफल भी है। अब सवाल यह है कि इस समीकरण को पूरा करने में BJP या JDU में से किसका कुर्बानी देना तय होगा।





