नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का माहौल बन चुका है और इस बार की तस्वीर पहले से काफी अलग दिख रही है। कभी देश की राजनीति की दिशा तय करने वाली कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अब क्षेत्रीय दलों के आगे रणनीतिक रूप से झुकती नजर आ रही हैं। एक ओर महागठबंधन में कांग्रेस अपने सहयोगियों के सामने बेबस दिख रही है, तो दूसरी ओर एनडीए में भाजपा को भी अपनी कई परंपरागत सीटें छोड़नी पड़ी हैं।
कांग्रेस की मेहनत, लेकिन नतीजा जीरों
कांग्रेस ने इस चुनाव के लिए लंबे समय से तैयारी की थी, जिलों में सर्वे कराया, फीडबैक लिया और मजबूत सीटें चुनीं। राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने कार्यकर्ताओं में जोश भी भरा। लेकिन सीट बंटवारे के वक्त कांग्रेस की एक न चली। पार्टी की सीटें घटकर 70 से 61 रह गईं। यानी 9 सीटों का नुकसान। सबसे बड़ा झटका यह रहा कि कांग्रेस को अपनी दो मौजूदा सीटें महाराजगंज और जमालपुर सहयोगियों को सौंपनी पड़ीं। वहीं, जिन नई सीटों पर वह उतरी है जैसे कुम्हरार, बनमनखी, बिहारशरीफ वे उसके लिए पूरी तरह अनजान इलाका हैं। यह स्थिति बताती है कि कांग्रेस अब अपनी जगह नहीं, बल्कि दूसरों की छोड़ी जगहों पर टिकने की कोशिश कर रही है। 2020 में 70 सीटों पर लड़ने के बावजूद पार्टी की स्ट्राइक रेट कमजोर रही थी, और 2025 में स्थिति और कठिन हो गई है।
मित्रों से ही मुकाबला!
महागठबंधन में इस बार सबसे दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस का असली मुकाबला विपक्ष से नहीं, अपने सहयोगियों से है। कुल 11 सीटों पर महागठबंधन के घटक दल आपस में भिड़े हैं। जिनमें 5 पर कांग्रेस बनाम राजद, और 4 पर कांग्रेस बनाम वाम दल हैं। यह साफ दिखाता है कि गठबंधन की एकजुटता मंच पर तो है, लेकिन जमीन पर साथी ही अब प्रतिद्वंदी बन गए हैं। एनडीए में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है। भाजपा जो 2020 में 110 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, इस बार 101 सीटों पर उतर रही है। यानी 9 सीटों की कटौती। सबसे दिलचस्प बात यह है कि छह जिलों मधेपुरा, खगड़िया, शेखपुरा, शिवहर, जहानाबाद और रोहतास में भाजपा ने कोई उम्मीदवार नहीं उतारा। कई ऐसे इलाके, जहां पार्टी पहले मजबूत मानी जाती थी, अब सहयोगियों को सौंप दिए गए हैं। 2020 में भाजपा ने रोहतास जिले की डिहरी और काराकाट सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन हार गई। इस बार उसने दोनों सीटें छोड़ दीं। यह दर्शाता है कि भाजपा को अपने पुराने गढ़ों को बचाना मुश्किल हो गया है। भाजपा ने अब अपनी रणनीति बदलते हुए पश्चिम और पूर्वी चंपारण जिलों पर पूरा फोकस किया है। पश्चिम चंपारण में पार्टी ने 8 उम्मीदवार उतारे हैं। पूर्वी चंपारण में 9 में से 7 सीटों पर भाजपा का दावा है। इसके अलावा पटना की 14 में से 7, दरभंगा की 6, मुजफ्फरपुर की 5 और भोजपुर की 5 सीटों पर भी भाजपा मैदान में है। पार्टी का लक्ष्य है कि इन जिलों से अधिकतम सीटें जीतकर राज्य में संतुलन बनाया जा सके।




