नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । बिहार में भारतीय जनता पार्टी नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने शानदार जीत दर्ज की है। एनडीए को कुल 202 सीटें मिलीं, जिसमें बीजेपी ने 89, जेडीयू ने 85, LJP R ने 19, HAM ने 5 और RLM ने 4 सीटें हासिल की हैं। इस जीत से एनडीए का प्रभाव मजबूत हुआ है।
हालांकि, बीजेपी के पास बिहार में बिना जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और नीतीश कुमार के भी सरकार बनाने का विकल्प है। इसके लिए वह महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अपनाए गए फॉर्मूले का इस्तेमाल कर सकती है, जिससे राज्य की राजनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है।
मौजूदा संख्याबल से अगर जेडीयू को बाहर कर दिया जाए, तो एनडीए की सीटें 117 तक पहुंच जाती हैं। यदि बीजेपी, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और आईआईपी के एक-एक विधायक को अपने पक्ष में कर लेती है, तो यह संख्या 119 तक पहुंच जाएगी, जो बहुमत से केवल तीन सीटें कम होंगी।
क्या था महाराष्ट्र का फॉर्मूला?
अब महाराष्ट्र फॉर्मूले की बात करें तो इसे “साम-दाम-दंड-भेद” कहा जाता है। इसका मतलब है किसी भी कीमत पर और किसी भी तरीके से सरकार बनाना। इसमें विपक्षी पार्टी के विधायकों को अपने पक्ष में लाना या बड़े दल में कुछ विधायकों के इस्तीफे करवाना शामिल है, ताकि बहुमत हासिल किया जा सके।
बिहार की सियासत में कई संभावित समीकरण
अब बिहार की सियासत में कई संभावित समीकरण बन सकते हैं, लेकिन तीन विकल्प ऐसे हैं जिनमें सफलता की संभावना अधिक दिख रही है। राजनीतिक अनुभव बताता है कि बीएसपी और आईआईपी का बीजेपी के साथ आना लगभग तय है। पिछली बार भी बीएसपी के एकमात्र विधायक सत्ता पक्ष के साथ शामिल हुए थे, जिससे संकेत साफ हैं।
पहला विकल्प है- लेफ्ट और AIMIM को तोड़ना
हालांकि यह फिलहाल नामुमकिन सा दिखता है। लेफ्ट पार्टी अपनी विचारधारा पर अडिग रहती है, इसलिए इसके विधायकों को तोड़ना हिमालय में सुराख करने जैसा काम होगा। AIMIM अपेक्षाकृत सॉफ्ट टारगेट जरूर है, पर इस बार हालात मुश्किल लग रहे हैं। फिर भी सियासत में छोटी पार्टियों के विधायक कब निष्ठा बदल लें, कहना मुश्किल है। यह खेल में कपड़े बदलने जैसा आसान भी हो सकता है।
दूसरा विकल्प है- कांग्रेस पार्टी को तोड़ना
कांग्रेस पार्टी के पास केवल 6 विधायक हैं, इसलिए इसे तोड़ना आसान माना जा सकता है। कुछ विधायकों को इस्तीफे दिला दिए जाएं या अपने पक्ष में कर लिया जाए, तो बीजेपी को बहुमत के करीब लाने में मदद मिल सकती है।
तीसरा विकल्प है- जेडीयू और आरजेडी को तोड़ना
जेडीयू और आरजेडी को तोड़ना, जो सीधे तौर पर नामुमकिन लगता है। लेकिन इनकी कुछ कुर्सियों के विधायकों को इस्तीफा दिलाकर विधानसभा की कुल ताकत कम की जा सकती है। इससे बहुमत का जादुई आंकड़ा 122 से घटकर कम हो जाएगा और फटाफट सरकार बनाने का रास्ता बन सकता है। महाराष्ट्र में बीजेपी ने यह तरीका पहले बड़ी सफलता और आसानी से अपनाया था।
सरकार बनाना तकनीकी तौर पर संभव
दूसरा और तीसरा विकल्प आसानी से सफल हो सकते हैं, यानी सरकार बनाना तकनीकी तौर पर संभव है। लेकिन इसमें एक पेच है। केंद्र की मौजूदा गठबंधन सरकार जेडीयू के समर्थन पर टिकी है। इसलिए बीजेपी फिलहाल सीधे किसी खेल को हरी झंडी नहीं देगी, लेकिन नीतीश कुमार पर नियंत्रण बनाए रखकर उन्हें अपने पक्ष में टिकाए रखने की रणनीति जरूर अपनाएगी।
क्या लागू होगा महाराष्ट्र और एमपी का फॉर्मूला?
बता दे कि, महाराष्ट्र में 2019 के चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, लेकिन शिवसेना और एनसीपी के गुटों से समझौता कर और राजनीतिक चालाकी दिखाकर सरकार चलाई। इसी तरह, मध्य प्रदेश में 2018 के चुनाव में भी बीजेपी को बहुमत नहीं मिला, लेकिन “साम-दाम-दंड-भेद” रणनीति से सरकार बनाई। राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब कांग्रेस केंद्र में सत्ता में थी, तब यह खेल उसकी ताकत था संभावना है कि बीजेपी ने इसे वहीं से सीखा हो।





