नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में मतदान के बीच बसपा प्रमुख मायावती चुनावी मैदान में सक्रिय हो रही हैं। उत्तर प्रदेश की तरह बिहार में भी दलित समाज की भूमिका निर्णायक मानी जाती है, लेकिन दोनों राज्यों में दलितों का राजनीतिक मिजाज अलग है।
उत्तर प्रदेश में कांशीराम के नेतृत्व में बसपा दलितों में सियासी चेतना जगाकर चार बार सत्ता तक पहुंचा, लेकिन यूपी जैसा करिश्मा बिहार में नहीं दिखा। इस बार बसपा बिहार में अपनी किस्मत आजमा रही है और यूपी से सटे बिहार की विधानसभा सीटों पर विशेष जोर दे रही है। मायावती गुरुवार को कैमूर जिले के भभुआ क्षेत्र में जनसभा को संबोधित करेंगी। यह वही क्षेत्र है जहां दूसरे चरण में मतदान होना है। इस कदम से यह देखने की बात होगी कि बिहार में बसपा यूपी जैसा प्रभाव दिखाने में सफल हो पाएगी या नहीं।
मायावती कैमूर में करेगी जनसभा
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान जारी है, जबकि दूसरे चरण के लिए वोटिंग 11 नवंबर को होगी। इस दौरान बसपा प्रमुख मायावती बिहार में अपनी पहली चुनावी रैली के जरिए राजनीतिक माहौल को साधने की तैयारी में हैं। मायावती कैमूर जिले के भभुआ हवाई अड्डे के मैदान में जनसभा को संबोधित करेंगी। इस रैली का उद्देश्य न केवल मतदाताओं से संवाद करना है, बल्कि पूरे बिहार चुनाव में सियासी नैरेटिव सेट करना भी है।
रैली के दौरान मायावती रामगढ़ और कैमूर विधानसभा सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों के पक्ष में मतदाताओं को संबोधित करेंगी। वे रामगढ़ से सतीश उर्फ पिंटू यादव और कैमूर (भभुआ) से विकास सिंह उर्फ लल्लू पटेल के समर्थन में जनता को आकर्षित करेंगी। इस तरह, मायावती की रैली कैमूर जिले की चारों सीटों भभुआ, रामगढ़, मोहनियां और चैनपुर पर बसपा की पकड़ मजबूत करने के इरादे से आयोजित की गई है।
बसपा का फोकस यूपी से सटी बिहार की सीटों पर
बसपा का खास ध्यान यूपी सीमा से सटे जिलों पर है। पार्टी ने अपने पूर्वांचल के कई नेताओं को बिहार के चुनावी मैदान में उतारा है। बसपा की रणनीति यह है कि यूपी से सटी सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला तैयार किया जाए, ताकि दलित वोट बैंक के एकजुट होने पर उसके उम्मीदवार की जीत की संभावना बढ़ सके।
पार्टी की नजर विशेष रूप से कैमूर जिले की चार सीटों भभुआ, मोहनियां, रामगढ़ और चैनपुर पर है। यही कारण है कि मायावती की रैली भी कैमूर में आयोजित की गई है। बसपा की कोशिश है कि दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को लामबंद किया जाए। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि मायावती की मौजूदगी कैमूर में सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है और बसपा के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है।
बसपा की रणनीति का टर्निंग पॉइंट
बसपा ने कैमूर जिले की चार सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर अपनी ताकत दिखाई है। पार्टी ने भभुआ से विकास उर्फ लल्लू पटेल, मोहनियां से ओम प्रकाश दीवाना, रामगढ़ से सतीश उर्फ पिंटू यादव और चैनपुर से धीरज उर्फ भान सिंह को मैदान में उतारा है।
इतिहास में भभुआ (2005) और चैनपुर (2020) सीटों में जीत दर्ज कर चुकी बसपा की जड़ें इस इलाके में गहरी हैं। ऐसे में मायावती की रैली से पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश और मतदाताओं में उत्साह बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। पार्टी ने आकाश आनंद के नेतृत्व में ‘सर्वजन हिताय यात्रा’ भी शुरू कर दी है, जिससे दलित-ओबीसी-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत किया जा सके। इस रणनीति के बीच मायावती का दौरा बसपा के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। अब सवाल यह है कि क्या मायावती की हुंकार कैमूर में बसपा को 2005 और 2020 जैसी सफलता दिला पाएगी?
यूपी से सटी बिहार की 36 सीटें
बिहार में लगभग 36 विधानसभा सीटें उत्तर प्रदेश की सीमा से सटी हुई हैं। यूपी के महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, चंदौली और सोनभद्र जिले बिहार के आठ जिलों से लगते हैं। वहीं, बिहार के सारण, सीवान, गोपालगंज, भोजपुर, पश्चिमी चंपारण, रोहतास, बक्सर और कैमूर जिले की कई सीटें यूपी के बॉर्डर के साथ आती हैं।
यूपी के पूर्वांचल और बिहार के पश्चिमी इलाके भाषा, रहन-सहन और सामाजिक ताना-बाना में काफी समान हैं। इसी कारण से इस क्षेत्र का जातीय और सियासी समीकरण भी काफी मिलता-जुलता है। बसपा का मजबूत सियासी आधार भी यहीं माना जाता है। बिहार में जहां पार्टी ने सफलता हासिल की है, वह ज्यादातर यूपी से सटी हुई सीटों पर रही है, क्योंकि इन इलाकों में दलित वोटरों की संख्या अच्छी खासी है। यही कारण है कि बसपा इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानती है।
बिहार की इन सीटों पर बसपा की पूरी ताकत
बिहार के गोपालगंज, कैमूर, चंपारण, सिवान और बक्सर जिलों की विधानसभा सीटों पर बसपा पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ रही है। पार्टी 15 से अधिक सीटों पर पूरी ताकत लगा रही है और दलित वोटरों को एकजुट कर रही है। चैनपुर सीट पर बसपा दो बार जीत दर्ज कर चुकी है। 2020 में यह सीट बसपा के खाते में रही थी, लेकिन बाद में जमा खान जेडीयू में चल गए।
बक्सर की रामगढ़ सीट पर बसपा से सतीश कुमार यादव मैदान में हैं, जिन्होंने उपचुनाव में भी कड़ी टक्कर दी थी। पार्टी को इस बार यहां जीत की उम्मीद है। वहीं, बक्सर सीट 2005 में बसपा के खाते में रही थी, यहां से अभिमन्यू कुशवाहा चुनावी मुकाबले में हैं। मोहनिया सीट पर बसपा ने ओम प्रकाश दीवाना को चुनावी मैदान में उतारा है। यहां आरजेडी का प्रत्याशी पर्चा खारिज हो जाने के बाद मुकाबला और भी दिलचस्प बन गया है।
बिहार में बसपा की रणनीति
बिहार में बसपा ने सासाराम की भगवती सीट से विकास सिंह, राजपुर से लालजी राम और बेलसंड तथा शिवहर सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। यूपी सीमा से सटे इन जिलों में पिछले चुनाव में एनडीए की सफलता नहीं हुई थी, लेकिन इस बार बसपा मजबूती से चुनावी लड़ाई में शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में यदि दलित वोट बैंक महागठबंधन से दूरी बनाता है, तो इसका एनडीए को फायदा हो सकता है। बसपा ने बिहार में अपने प्रत्याशियों के चयन में यूपी में काम आए अपने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को अपनाया है। इसका मतलब है कि बिहार के चुनाव नतीजों का असर यूपी की सियासत पर भी पड़ सकता है, खासकर दलित वोटर और गठबंधन समीकरण पर।





