नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पहले तक मुख्य मुकाबला महागठबंधन (राजद-कांग्रेस) और एनडीए (भाजपा-जदयू) के बीच था, वहीं इस बार तीन नए बड़े खिलाड़ी मैदान में हैं। इनमें बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती, आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और जन सुराज अभियान के संस्थापक प्रशांत किशोर शामिल हैं। तीनों नेताओं ने बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है, जो बिहार की राजनीति के लिए एक साहसिक और चुनौतीपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह चुनाव तीन अलग-अलग राजनीतिक मॉडल की परीक्षा का मैदान होगा, जिसमें यह तय होगा कि जनता किसके मॉडल को अपना जनादेश देती है।
मायावती ने चला ये दांव
मायावती, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति की जानी-मानी नेता हैं, बिहार में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पूरी तैयारी में हैं। पहले बिहार में बसपा के पांव ज़मीन तक नहीं पहुंच पाए थे। 2005 और 2010 में बसपा ने कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन वोट शेयर दो प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाया। 2025 में मायावती ने बड़ा ऐलान किया है कि “दलित, पिछड़े और वंचित वर्ग की असली लड़ाई अब बसपा ही लड़ेगी।” बिहार में दलित आबादी करीब 16% है जो आज तक राजद और कांग्रेस के साथ रही हैं। अगर बसपा यहां से सिर्फ 5-7% वोट भी खींचने में कामयाब होती है, तो यह महागठबंधन के लिए बड़ी चोट साबित हो सकता है।
दिल्ली-पंजाब मॉडल के भरोसे मैदान में उतरी “आप”
अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) पहली बार बिहार में बड़ी तादाद में चुनावी मैदान में उतर रही है। दिल्ली और पंजाब में सफल सरकार चलाने का अनुभव लेकर केजरीवाल अब बिहार के सामने अपनी सबसे बड़ी ताकत शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की गारंटी को रख रहे हैं। उनका स्पष्ट लक्ष्य है शहरी मतदाता, नौकरीपेशा वर्ग और युवाओं को अपने साथ जोड़ना। पटना, गया, भागलपुर, दरभंगा और मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहरों में आम आदमी पार्टी को अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है। केजरीवाल का संदेश है कि बिहार की राजनीति को अब जातिवाद और भ्रष्टाचार के दौर से आगे बढ़ना होगा। उनका वादा है कि दिल्ली की तरह बिहार में भी शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता सुधारी जाएगी और रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएंगे। हालांकि, बिहार में आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है जमीनी संगठन का अभाव, जो उन्हें स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ बनाने में मुश्किल पैदा कर सकता है।
प्रशांत किशोर भी सुशासन का वादा कर उतरे मैदान में
चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (पीके) की राजनीतिक एंट्री बिहार में सबसे दिलचस्प मानी जा रही है। 2022 में शुरू हुई उनकी ‘जन सुराज पदयात्रा’ ने हजारों गांवों तक उनकी आवाज पहुंचाई और व्यापक जमीनी संपर्क बनाए। पीके का कहना है कि वे सत्ता के लिए नहीं, बल्कि बिहार को बदलने के मिशन के साथ राजनीति में आए हैं। उनका फोकस ग्रामीण इलाकों, युवाओं और महिलाओं पर है। वे जातीय राजनीति से ऊपर उठकर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुशासन की बात करते हैं। हालांकि, बिहार के राजनीतिक इतिहास ने यह भी साबित किया है कि जमीनी संगठन और जातीय समीकरण ही चुनाव में जीत की बड़ी वजह है। इसलिए सवाल यह बना हुआ है कि क्या प्रशांत किशोर की मेहनत और नीतियां वोट में तब्दील हो पाएंगी।





