नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। झारखंड का राजनीतिक इतिहास उथल-पुथल से भरपूर रहा है। राज्य निर्माण को 24 साल के अंदर राज्य में तीन बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है, राज्य ने 13 अलग-अलग सरकार और सात मुख्यमंत्री देख लिए हैं। राजनीतिक उठापटक के बीच एक नेता के मुख्यमंत्री बनने की कहानी बेहद दिलचस्प रही है। ये एक नेता के निर्दलीय विधायक रहते हुए मुख्यमंत्री बनने की कहानी है। हम बात कर रहे हैं राज्य के चौथे मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की।
पिता थे किसान, चाहते थे कि बेटा सरकारी नौकरी करे
मधु कोड़ा की शुरुआत बेहद सामान्य रही। पिता किसान थे, एक एकड़ जमीन पर खेती करते थे और चाहते थे कि बेटे की पुलिस में या कहीं पर सम्मानजनक नौकरी लग जाए। वो नहीं चाहते थे कि उनका बेटा राजनीति में आए। लेकिन मधु कोड़ा की कहानी में केवल कर्मचारी बन जाना नहीं था। शुरुआत में मजदूरी करने वाले मधु कोड़ा की राजनीतिक शुरुआत छात्र राजनीति से हुई। बाद में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े।
RSS में काम करने के दौरान मधु कोड़ा बाबू लाल मरांडी के संपर्क में आए। मरांडी मधु कोड़ा के काम से प्रभावित थे। साल 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में मधु कोड़ा ने जगन्नाथपुर विधानसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता। इसी साल बिहार से अलग होकर झारखंड अलग राज्य बना। बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बने। उन्होंने मधु कोड़ा को अपनी सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री बनाया। लगभग दो साल तक सब ठीक चला, लेकिन फिर झारखंड बीजेपी के अंदर विद्रोह की सुगबुगाहट होने लगी। मार्च, 2003 में अर्जुन मुंडा राज्य के मुख्यमंत्री बनाए गए। उनकी सरकार में मुंडा पंचायती राज मंत्री बनाए गए।
2005 का चुनाव और लटकी हुई विधानसभा
साल 2005 में झारखंड में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में बीजेपी ने मधु कोड़ा को टिकट नहीं दिया। मधु कोड़ा ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। हालांकि, इस चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। 30 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, JMM को 17 सीटें मिलीं, वहीं कांग्रेस ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी। अन्य पार्टियों के समर्थन के दम पर शिबू सोरेन ने सरकार बनाने का दावा पेश किया, वो सीएम बने, हालांकि वो विधानसभा में बहुमत साबित करने में सफल नहीं हुए, इसके चलते उन्हें 9 दिन के अंदर ही इस्तीफा देना पड़ा।
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इसके बाद मधु कोड़ा और अन्य निर्दलीय विधायकों के सहयोग से अर्जुन मुंडा ने सरकार बनाई। इस सरकार में मधु कोड़ा को मंत्री पद भी मिला। हालांकि, सितंबर, 2006 में मधु कोड़ा और अन्य निर्दलीय विधायकों ने अर्जुन मुंडा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। बहुमत नहीं होने की वजह से मुंडा को इस्तीफा देना पड़ा।
इसके बाद शिबू सोरेन के नेतृत्व वाले UPA के समर्थन से मधु कोड़ा राज्य के चौथे मुख्यमंत्री बने। मधु कोड़ा सितंबर 2006 से अगस्त, 2008 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। यह अपने आप में ऐतिहासिक है कि एक निर्दलीय विधायक अपने राजनैतिक गुणा-गणित का प्रदर्शन करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गया। तब मधु कोड़ा की उम्र केवल 35 साल के करीब थी। अगस्त 2008 में UPA ने अपना समर्थन वापस ले लिया और फिर शिबू सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने।
भ्रष्टाचार मामले में कन्विक्शन और चुनाव लड़ने पर बैन
सीएम पद से हटने के बाद मधु कोड़ा ने साल 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ा, सिंहभूम लोकसभा सीट से। इस चुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की। साल 2009 में मधु कोड़ा को कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला मामले में ED ने गिरफ्तार किया। आरोप था कि कोड़ा और उनके सहयोगियों ने गैर-कानूनी तरीके से डील करके 4000 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति जुटाई। अगस्त, 2013 तक मधु कोड़ा जेल में रहे। इसके बाद जमानत पर रिहा हुए।
साल 2017 में कोड़ा को भ्रष्टाचार मामले में दोषी पाया गया और तीन साल की सज़ा सुनाई गई। नियमों के अनुसार, अगर कोई नेता भ्रष्टाचार का दोषी पाया जाता है तो उसे चुनाव लड़ने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। इस साल विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए मधु कोड़ा ने याचिका लगाई थी कि उनकी सज़ा पर रोक लगा दी जाए। हालांकि, 18 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट और फिर 25 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सज़ा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
पति की विरासत पत्नी गीता कोड़ा संभाली
साल 2009 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मधु कोड़ा ने अपनी पार्टी बनाई। नाम रखा जय भारत समानता पार्टी। इस पार्टी के टिकट पर उनकी पत्नी गीता कोड़ा ने दो बार जगन्नाथपुर विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की। साल 2018 में पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में गीता कोड़ा ने कांग्रेस के टिकट पर सिंहभूम लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। वो 2019 में झारखंड से कांग्रेस की इकलौती सांसद थीं। गीता कोड़ा के लोकसभा जाने के बाद मधु कोड़ा ने अपने करीबी सोनाराम सिंकू को जगन्नाथपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया और जीत सुनिश्चित की।
मधु कोड़ा को उम्मीद थी कि उनकी सज़ा पर रोक लगेगी तो सिंकू उनके लिए सीट खाली कर देंगे। फरवरी, 2024 में गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गईं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें सिंहभूम से टिकट दिया, हालांकि, सिंकू के तेवर बदल चुके थे। उन्होंने कोड़ा के खिलाफ जमकर प्रचार किया और कोड़ा चुनाव हार गईं। अब विधानसभा चुनाव में गीता कोड़ा जगन्नाथपुर सीट से चुनाव लड़ रही हैं। यहां उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस के सोनाराम सिंकू से है।
Jharkhand Assembly Elections:जब निर्दलीय विधायक रहते हुए भी झारखंड के CM बन गए मधु कोड़ा, ये है कहानी





