नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश में जाति आधारित रैलियों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने योगी सरकार से सख्त सवाल पूछे हैं। अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पहले के आदेशों के बावजूद सरकार यह स्पष्ट नहीं कर रही कि अगर कोई राजनीतिक दल जाति के नाम पर रैली करता है तो वह क्या कदम उठाएगी। यह मामला स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। न्यायमूर्ति राजन रॉय और राजीव भारती की खंडपीठ ने सरकार से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई की तारीख 30 अक्टूबर 2025 तय की है।
High Court का सख्त रुख
अदालत ने याद दिलाया कि 11 जुलाई 2013 को ही जाति आधारित रैलियों पर रोक लगा दी गई थी। इसके बावजूद इस आदेश के अनुपालन को लेकर सरकार ने अब तक ठोस हलफनामा नहीं दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर तीन दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो संबंधित प्रमुख सचिव को खुद अदालत में पेश होना होगा।
सरकार ने कहा ,“हमने पहले ही प्रतिबंध लगाया है”
राज्य सरकार के वकील ने अदालत को बताया कि 21 सितंबर 2025 को एक सरकारी आदेश जारी किया गया है, जिसमें राजनीतिक उद्देश्यों के लिए जाति आधारित रैलियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। इस पर कोर्ट ने पूछा कि अगर आदेश जारी हो चुका है, तो फिर हलफनामा दाखिल करने में देरी क्यों की गई? पिछली सुनवाई में निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया था कि आचार संहिता के दौरान जाति आधारित रैलियों पर पूरी तरह से रोक है। इसके बावजूद अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा था कि ऐसे मामलों में कार्रवाई का अधिकार किसके पास है राज्य सरकार के पास या आयोग के पास?
संविधान की भावना के खिलाफ है जाति आधारित राजनीति
अदालत ने अपने पुराने आदेश का हवाला देते हुए कहा कि जाति आधारित रैलियां समाज को बांटती हैं और यह संविधान की भावना और मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में किसी को भी जाति के आधार पर समाज में भेदभाव फैलाने का अधिकार नहीं है।





