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Saturday, April 11, 2026
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भारत ने किया एंटी सबमरीन रॉकेट का कामयाब परीक्षण, 8.9 किमी की दूरी से ही मार गिराएगा दुश्मन की पनडुब्बी

नौसेना को ऐसे रॉकेट की जरूरत है, जिससे सटीक हमला करके लक्ष्य को एक बार में ही नष्ट किया जा सके, ताकि दुश्मन को भारतीय पनडुब्बी की लोकेशन न मिल सके।

नई दिल्ली, एजेंसी। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने गुरुवार को विध्वंसक युद्धपोत आईएनएस चेन्नई से एंटी सबमरीन रॉकेट के विस्तारित रेंज संस्करण का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। पहले के संस्करण में 5 किमी. रेंज थी, जिसे अब बढ़ाकर 8.9 किमी. कर दिया गया है। एंटी सबमरीन रॉकेट की रेंज बढ़ाये जाने के बाद भारतीय नौसेना की पनडुब्बियों से लम्बी दूरी तक हमले करने की क्षमता बढ़ेगी।

एआरडीई ने 2018 में नौसेना के लिए एक नई रॉकेट तकनीक का विकसा किया

डीआरडीओ की पुणे स्थित प्रयोगशाला आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टैब्लिशमेंट (एआरडीए) ने 8.5 किमी की अधिकतम सीमा के साथ एंटी-पनडुब्बी रॉकेट विकसित किया है। इसके विकास में डीआरडीओ की ही एक अन्य प्रयोगशाला हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (एचईएमआरएल) ने भी सहयोग किया है। एआरडीई ने 2018 में नौसेना के लिए एक नई रॉकेट तकनीक विकसित करके आंतरिक परीक्षण किये थे। पनडुब्बियों का मुकाबला करने के लिए इन रॉकेटों को आरबीयू 6000 रॉकेट लॉन्चर से दागा जाता है, जो आर-क्लास, दिल्ली क्लास और तलवार क्लास के भारतीय नौसेना के जहाजों पर लगे होते हैं।

नौसेना की आवश्यकताओं के अनुसार रॉकेट का विकास किया

डीआरडीओ के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि भारतीय नौसेना को विस्तारित रेंज के एंटी-सबमरीन रॉकेट की जरूरत है, जो दुश्मन की पनडुब्बी को 8 किमी की दूरी से मार सके। इसलिए वैज्ञानिकों के एक समूह ने इस परियोजना पर काम किया और नौसेना की आवश्यकताओं के अनुसार रॉकेट का विकास किया। पहले के संस्करण में 5 किमी. रेंज थी, जिसे अब बढ़ाकर 8.9 किमी. कर दिया गया है। अभी भी नौसेना की आवश्यकताओं के आधार पर काम कर रहे हैं। भारतीय नौसेना के एक पनडुब्बी रोधी अधिकारी ने कहा कि दुश्मन की पनडुब्बी को घेरने के लिए टॉरपीडो दागना जानबूझकर किया गया हमला माना जाता है और यह हमला विफल होने पर दुश्मन को पनडुब्बी की लोकेशन मिल सकती है।

रॉकेट को मुख्य रूप से ‘तत्काल हमले के हथियार’ के रूप में देखा जाता है

इसलिए, नौसेना को ऐसे रॉकेट की जरूरत है, जिससे सटीक हमला करके लक्ष्य को एक बार में ही नष्ट किया जा सके, ताकि दुश्मन को भारतीय पनडुब्बी की लोकेशन न मिल सके। रॉकेट को मुख्य रूप से ‘तत्काल हमले के हथियार’ के रूप में देखा जाता है, जिसे पनडुब्बियों के हमले को बाधित करने के लिए एकल या सल्वो के रूप में दागा जा सकता है। इसलिए, रॉकेट की भूमिका टॉरपीडो जितनी ही महत्वपूर्ण है। अधिकारी ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र में विदेशी पनडुब्बियों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए एक विस्तारित रेंज रॉकेट होना समय की आवश्यकता है, जो दूर से शत्रु पनडुब्बियों को मार सके।

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