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Monday, March 2, 2026
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India’s Republic Journey: आजादी के बाद से अब तक की 75 साल की गणतंत्र यात्रा की झलक

साल 2026 में भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, यह यात्रा संविधान के सहारे देश की प्रगति, लोकतंत्र और सांस्कृतिक गौरव की कहानी बयां करती है

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। हर साल 26 जनवरी को पूरा देश गणतंत्र दिवस मनाता है। दरअसल, 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ और भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में दुनिया के सामने खड़ा हुआ। साल 2026 में भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक और रोचक यात्रा का प्रतीक है, जिसमें देश ने संविधान के सहारे खुद को लगातार मजबूत किया।

26 जनवरी 1950 की सुबह दिल्ली में उत्सव जैसा माहौल था। देश एक नए संविधान के साथ नई शुरुआत कर रहा था। लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे और मंदिरों में खुशहाली के लिए प्रार्थना हो रही थी। उसी दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने उन्हें शपथ दिलाई। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनके कैबिनेट ने भी पद की शपथ ली। यह ऐतिहासिक आयोजन उस समय राजपथ पर हुआ, जिसे 2022 में कर्तव्य पथ का नाम दिया गया।

विदेशी मेहमानों की परंपरा

भारत ने पहले ही गणतंत्र दिवस से विदेशी मेहमानों को आमंत्रित करने की परंपरा शुरू कर दी थी। 1950 में पहले मुख्य अतिथि बने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो। इसके बाद हर साल कई विदेशी राष्ट्राध्यक्षों ने इस पर्व की शोभा बढ़ाई। इस परंपरा को जारी रखते हुए इस बार यूरोपीय संघ के दो शीर्ष नेता को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। यूरोपीय कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा पहली बार परेड में शामिल होंगे।

नेशनल स्टेडियम और पहला फ्लाई पास्ट

पहले गणतंत्र दिवस परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम नेशनल स्टेडियम में आयोजित किए गए थे। शाम के समय राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद घोड़ों की बग्घी में सवार होकर पहुंचे। उसी दिन दिल्ली ने पहली बार वायु सेना का फ्लाई पास्ट देखा, जिसने लोगों को रोमांचित कर दिया।

1955 से परेड की नियमित परंपरा

गणतंत्र दिवस परेड का नियमित आयोजन 1955 से शुरू हुआ। शुरुआती सालों में परेड नेशनल स्टेडियम, लाल किला और रामलीला मैदान में होती थी। इसमें झांकियां, वीरता पुरस्कार विजेता बच्चे, सेना और अर्धसैनिक बलों के करतब शामिल होते गए। ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत बताते हैं कि उस समय झांकियां और वीर सैनिकों का सम्मान दर्शकों को सबसे ज्यादा आकर्षित करता था।

बालवीरों और झांकियों की भूमिका

1959 से गणतंत्र दिवस परेड में वीरता पुरस्कार से सम्मानित बच्चों को शामिल किया जाने लगा। पहले ये बच्चे हाथियों पर सवार होते थे, अब खुली जीप में नजर आते हैं। झांकियों की परंपरा हमेशा से देश की सांस्कृतिक विविधता और विकास को दर्शाती रही है। अलग-अलग दौर में शिक्षा, हरित क्रांति, सामाजिक सुधार, संस्कृति और देश की उपलब्धियां झांकियों के माध्यम से प्रदर्शित की गई।

परेड का रूट और सुरक्षा

2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद 2002 से परेड का रूट बदल गया। अब परेड इंडिया गेट से शुरू होकर आईटीओ और दरियागंज होते हुए लाल किले पर समाप्त होती है।

संविधान के सहारे बदला भारत

संविधान लागू होने के बाद भारत ने कई बड़े बदलाव देखे। सभी नागरिकों को मतदान का अधिकार मिला, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार हुआ, राज्यों का पुनर्गठन हुआ और पंचायती राज व्यवस्था से लोकतंत्र गांव-गांव तक पहुंचा। सूचना का अधिकार जैसे कानूनों ने शासन को अधिक पारदर्शी बनाया।

77 साल की इस गणतंत्र यात्रा ने भारत को सशक्त, लोकतांत्रिक और विकसित राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ाया। हर गणतंत्र दिवस सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि संविधान के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और देशभक्ति का जश्न है। 26 जनवरी 2026 पर जब देश कर्तव्य पथ पर झांकियों और परेड का आनंद लेगा, यह सिर्फ भव्य समारोह नहीं, बल्कि संविधान के सहारे बनाई गई भारत की मजबूती का प्रतीक भी होगा।

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