"हर एक कूचा है साकित हर इक सड़क वीराँ हमारे शहर में तक़रीर कर गया ये कौन" शमीम शहज़ाद का ये नज्म हालिया हालात पर बहुत मौजूं है। कितनी मामूली हसरतें होती है एक साधारण आदमी की। मेहनत के पसीने से बरक्कत की दो रोटियां, गुजारे लायक छत, बच्चों को क्लिक »-www.prabhasakshi.com
दिल्ली का दिल कब-कब एक दूसरे की सलामती के लिए धड़कना बंद हुआ, सदर बाजार से जहांगीरपुरी तक राजधानी के दंगों का संपूर्ण इतिहास
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