नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। श्रीलंका दौरे से लौटे किसान नेता राकेश टिकैत ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा भारत के कुछ इलाकों को ‘मिनी पाकिस्तान’ कहे जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है जहां इसपर राकेश टिकैत ने कहा कि, यदि ऐसा बयान किसी मुस्लिम धर्मगुरु ने दिया होता, तो अब तक सख्त कार्रवाई हो चुकी होती।
”धार्मिक व्यक्ति विवादित बयान देने से बचें”
राकेश टिकैत ने चेताया कि महाराज जैसे सम्मानित धार्मिक व्यक्ति विवादित बयान देने से बचें और कहा कि सरकार ऐसे बयान चाहती है, ताकि समाज में बहस और बंटवारा बढ़े। राकेश टिकैत ने आरोप लगाया कि धर्मगुरु अब इस एजेंडे का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जबकि उन्हें इससे दूर रहना चाहिए।किसान नेता राकेश टिकैत ने यह भी कहा कि इस तरह के धार्मिक और सामाजिक बयानों से भारत की वैश्विक छवि धूमिल हो रही है। दुनिया में भारत को अब जाति, धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर बंटा देश दिखाया जा रहा है।
श्रीलंका दौरे की जानकारी
राकेश टिकैत हाल ही में श्रीलंका गए थे, जहां उन्होंने किसानों, आदिवासियों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों से बातचीत की। टिकैत ने बताया कि वहां कई मुद्दों पर चर्चा हुई, जैसे पर्यावरण, फसल सुरक्षा और भूमि हनन। उन्होंने कहा कि, भारत में विवादित तीन कृषि कानूनों को ‘काला कानून’ कहा गया, जो वहां के मंच पर भी उठाया गया और इस शब्द को हटा दिया गया। टिकैत ने भाषाई और सांस्कृतिक अंतर पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि कुछ देशों में आंदोलनकारी को ‘टेररिस्ट’ कहा जाता है, जबकि भारत में इसका अर्थ ‘आतंकवादी’ है।
”भारत की वैश्विक छवि धूमिल हो रही है”
राकेश टिकैत का दावा है कि, इस तरह के धार्मिक और सामाजिक बयानों से भारत की वैश्विक छवि धूमिल हो रही है,श्रीलंका दौरे पर टिकैत ने बताया कि वहां उन्होंने कृषि, पर्यावरण और आदिवासी भूमि के मुद्दों पर चर्चा की और लली प्लेटफॉर्म के माध्यम से रिपोर्टिंग यूएनए तक भेजी जाएगी। टिकैत ने कहा कि, सरकार ऐसे बयान चाहती है ताकि समाज में बहस और बंटवारा बढ़े, लेकिन धर्मगुरु को इससे दूर रहना चाहिए। उन्होंने भाषाई और सांस्कृतिक अंतर पर भी ध्यान दिलाया और बताया कि भारत में ‘आंदोलनकारी’ को कभी ‘टेररिस्ट’ नहीं कहा जाता।
श्रीलंका दौरे पर गए थे राकेश टिकैत
राकेश टिकैत हाल ही में श्रीलंका दौरे पर थे, जहां उन्होंने किसानों, आदिवासियों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ संवाद किया। टिकैत ने बताया कि लली प्लेटफॉर्म की यह तीसरी कॉन्फ्रेंस थी, जिसमें करीब 2000 लोग और 850 डेलिगेट्स शामिल थे। मंच पर कोई भेदभाव नहीं था और वहां किसानों, व्यापारियों, आदिवासियों और महिलाओं ने खुलकर अपने मुद्दों पर बातचीत की।उन्होंने कहा कि वहां पर्यावरण और फसलों की सुरक्षा, आदिवासी भूमि हनन जैसे विषयों पर चर्चा हुई। टिकैत ने कहा कि यह शब्द रंगभेद को दर्शाता है, इसलिए उसे मंच से हटा दिया गया।
भाषाई और सांस्कृतिक अंतर
टिकैत ने भाषाई और सांस्कृतिक अंतर पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि कुछ देशों में आंदोलनकारी को ‘टेररिस्ट’ कहा जाता है, जबकि भारत में इसका अर्थ ‘आतंकवादी’ है। उन्होंने लली प्लेटफॉर्म की सफलता की बात की और कहा कि वहां पूरी रिपोर्टिंग और डिक्लेरेशन तैयार किया गया, जो यूएनए तक भेजा जाएगा। राकेश टिकैत ने कहा कि धार्मिक व्यक्ति विवादित बयान देकर समाज में बंटवारा नहीं बढ़ाएँ। सरकार के एजेंडे की वजह से धर्मगुरु अब इस प्रक्रिया में शामिल होते जा रहे हैं, जबकि उन्हें समाज के लिए शांतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।





