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Vijaya Ekadashi 2024: विजया एकादशी के दिन इन मंत्रों का करें जाप, माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु होंगे प्रसन्न

विजया एकादशी के दिन भगवान विष्णु का व्रत और उनके साथ-साथ माता लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार, विजया एकादशी तिथि की शुरुआत 06 मार्च को पड़ रही है।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। 6 March 2024। हिंदू धर्म में एकादशी बहुत ही महत्वपूर्ण तिथि होती है। इस दिन सभी लोग भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए व्रत रखते हैं। वहीं एकादशी में कई नियम है जिनका पालन करना भी बहुत जरूरी होता है।

विजया एकादशी का महत्व

विजया एकादाशी के महत्व को कई हिंदू शास्त्रों में वर्णित किया गया है। शाब्दिक अर्थ में ‘विजया’ शब्द जीत का प्रतीक है। विजया एकादशी का पालन और व्रत रखने से जीवन की कठिन परिस्थिति में व्यक्ति को सफलता और जीत प्रदान होती है। यह सभी प्रकार की बाधाओं और बाधाओं से राहत प्रदान करने में मदद करता है। यदि लोग इस दिन दान करते हैं, तो उन्हें अतीत और वर्तमान पापों से मुक्ति मिलती है और फलदायी परिणाम भी मिलते हैं। हर महीने में दो एकादशी होती है। एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष में। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि विजया एकादशी की पूजा में विशेष चीजों का ध्यान रखने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। वहीं जो लोग व्रत नहीं रखते हैं वह अपने भोजन में चावल का उपयोग नहीं करते हैं। ऐसा माना जाता है की एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।

विजया एकादशी शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, विजया एकादशी तिथि की शुरुआत 06 मार्च को सुबह 06 बजकर 30 मिनट से होगी और इसके अगले दिन यानी 07 मार्च को सुबह 04 बजकर 13 मिनट पर तिथि का समापन होगा।

पूजा विधि

इस दिन आप को गंगा जी में स्नान करना चाहिए। कोशिश करे की इस दिन आप पीले वस्त्र धारण करें। क्योंकि विष्णु भगवान को पीले वस्त्र बहुत प्रिय हैं। सबसे पहले सुबह सूर्य देव को जल अर्पित करें। चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर कर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। इसके बाद उन्हें पीले रंग का फल, फूल आदि विशेष चीजें अर्पित करें।भगवान को भोग लगाए और उसमे तुलसी दल अवश्य रखें। फिर दीपक जलाकर आरती करें और विष्णु चालीसा का पाठ करें।

इन मंत्रों का की जाप

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।

हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।

ॐ नारायणाय विद्महे।

वासुदेवाय धीमहि ।

तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

ॐ विष्णवे नम:

ॐ भूरिदा भूरि देहिनो , मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि ।

ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि ।

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डिसक्लेमर

इस लेख में प्रस्तुत किया गया अंश किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की पूरी सटीकता या विश्वसनीयता की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारियां विभिन्न स्रोतों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/प्रामाणिकताओं/धार्मिक प्रतिष्ठानों/धर्मग्रंथों से संग्रहित की गई हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य सिर्फ सूचना प्रस्तुत करना है, और उपयोगकर्ता को इसे सूचना के रूप में ही समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त, इसका कोई भी उपयोग करने की जिम्मेदारी सिर्फ उपयोगकर्ता की होगी।

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