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Wednesday, April 1, 2026
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रोहिंज्या शरणार्थियों के लिये जानलेवा साबित हुईं समुद्री मार्ग से यात्राएँ – UNHCR

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि बंगाल की खाड़ी और अण्डमान सागर में जोखिम भरे समुद्री मार्गों से यात्राएँ करने वाले शरणार्थियों के लिये, वर्ष 2020 अब तक का सबसे घातक साल साबित हुआ है. यूएन एजेंसी की रिपोर्ट, “Left Adrift at Sea: Dangerous Journeys of Refugees Across the Bay of Bengal and Andaman Sea”, बताती है कि इन ख़तरनाक समुद्री मार्गों पर यात्रा करने वाले शरणार्थियों में दो-तिहाई संख्या महिलाओं व बच्चों की है. वर्ष 2020 में दो हज़ार 413 लोगों ने ऐसी यात्राएँ की, जिनमें से 218 की या तो मौत हो गई या फिर वे लापता हो गए. वर्ष 2019 की तुलना में 2020 में की गई समुद्री यात्राएँ आठ गुना ज़्यादा घातक थीं. पिछले वर्ष, कोविड-19 महामारी से उपजे हालात के कारण, दक्षिण-पूर्व एशिया में अनेक देशों ने अपनी सीमाओं पर सख़्ती लागू कर दी थी और शरणार्थियों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई. इसके मद्देनज़र, बड़ी संख्या में शरणार्थी समुद्र में ही फँसे रहने के लिये मजबूर हो गए. वर्ष 2015 में क्षेत्र में उत्पन्न हुए ‘नाव संकट’ के बाद, समुद्र में फँसे शरणार्थियों का यह सबसे बड़ा आँकड़ा था. रिपोर्ट के मुताबिक ये जानलेवा यात्राएँ कोई नई बात नहीं हैं. पिछले एक दशक में, हज़ारों रोहिंज्या शरणार्थियों ने म्याँमार में राखीन प्रान्त और बांग्लादेश में कॉक्सेस बाज़ार के शिविरों से समुद्री यात्राएँ की हैं. कठिनाई भरा जीवन जोखिम भरी इन यात्राओं की वजहें मूल रूप से म्याँमार में हैं, जहाँ रोहिंज्या समुदाय को उनकी नागरिकता और बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया गया है. जिन रोहिंज्या लोगों को पड़ोसी देशों में शरण मिली है, वहाँ उनकी आवाजाही, आजीविका, शिक्षा पर पाबन्दी है. इन हालात में उनके लिये क्षेत्र में किसी अन्य देश का रुख़ करते हुए, भविष्य की तलाश करना मजबूरी बन जाता है. WFP/Nihab Rahman बांग्लादेश के कॉक्सेज़ बाज़ार में मौजूद शरणार्थी शिविर में रहने वाले लोगों के लिए यूएन विश्व खाद्य कार्यक्रम ने भारी बारिश के बाद व्यापक खाद्य सहायता कार्यक्रम चलाया. अनेक प्रकार की ऐसी वजहें, अक्सर आपस में गुंथी हुई हैं और अक्सर इनमें अपने परिवार के सदस्यों के साथ फिर से मिलने की आकाँक्षा भी है. बताया गया है कि इन यात्राओं का प्रयास करने वाले लोगों के लिये जोखिम बढ़ गए हैं. पहले के वर्षों की तुलना में अब यात्रियों में महिलाओं व बच्चों की संख्या अधिक है, जिनके लिये तस्करों का शिकार होने का जोखिम अधिक रहता है. उनके लिये हालात इसलिये भी विकट हो जाते हैं, चूँकि यात्राओं का अन्त करने के लिये उन्हें अन्तिम सुरक्षित पड़ाव कहीं दिखाई नहीं देता है. वर्ष 2020 से अनेक शरणार्थियों को महीनों तक अक्सर ऐसी नावों में फँसा रहना पड़ा, जो कि समुद्र में इस्तेमाल के लिये उपयुक्त नहीं हैं. उनके लिये तस्करों द्वारा दुर्व्यवहार किये जाने और पर्याप्त भोजन व जल के अभाव में बीमार पड़ने, और समुद्री यात्रा के दौरान ख़राब परिस्थितियों – तेज़ लहरों, तूफ़ानों – को झेलने का ख़तरा अधिक है. जब देश इन नावों से शरणार्थियों को उतरने देने व देश में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते हैं, तो यह संकट और गहरा हो जाता है. उपायों का खाका यूएन शरणार्थी एजेंसी ने क्षेत्र में सभी देशों से समुद्र में फँसे शरणार्थियों की तलाश एवँ बचाव सुनिश्चित करने और उन्हें सुरक्षित स्थान पर शरण प्रदान किये जाने की पुकार लगाई है. साथ ही पूर्वसूचनीय (predictable) व न्यायसंगत ढँग से जहाज़ से उतारे जाने के लिये एक क्षेत्रीय ढाँचा तैयार करने की दिशा में प्रयासों पर बल दिया गया है. नावों से उतरने वाले शरणार्थियों के लिये शरण सम्बन्धी प्रक्रियाओं की सुलभता सुनिश्चित करनी होगी. अन्य देशों व यूएन एजेंसी के साथ मिलकर क्षेत्र में आगमन के लिये प्रबन्ध किये जाने होंगे और संरक्षा व सहायता उपाय मुहैया कराने होंगे. इसके समानान्तर, शरणार्थियों द्वारा समुद्री मार्ग का सहारा लिये जाने के बुनियादी कारणों को दूर करना अहम बताया गया है. –संयुक्त राष्ट्र समाचार/UN News

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