नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। 2020 के उत्तर‑पूर्वी दिल्ली दंगों में फरवरी महीने में हुई हिंसा ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए। दिल्ली पुलिस ने इस गंभीर घटना की जांच के बाद उमर खालिद, शरजील इमाम समेत 7 लोगों के खिलाफ “बड़ी साजिश” का मामला दर्ज किया। आरोपियों पर Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की गंभीर धाराओं के तहत मामला बनाया गया। पुलिस का कहना था कि ये दंगे पूर्व‑योजना के तहत orchestrated और well‑designed थे, यानी यह कोई अचानक भड़क गई हिंसा नहीं थी, बल्कि सोची-समझी साजिश थी।
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला (5 जनवरी 2026)
सोमवार, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जमानत याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कुल 7 आरोपियों में से 5 को जमानत दे दी, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम की याचिकाएं खारिज कर दीं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल थीं।
क्यों नहीं मिली जमानत?
अदालत ने स्पष्ट किया कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका इस मामले में केंद्रीय और गंभीर थी। न्यायपालिका ने यह भी कहा कि केवल लंबे समय तक जेल में रहना जमानत देने का आधार नहीं बन सकता। दोनों आरोपी अब ट्रायल कोर्ट में पुनः जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्येक आरोपी के मामले को अलग-अलग आधार पर तौला और फैसला दिया।
अनुच्छेद 21 पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के महत्व को स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि अक्सर जमानत के समर्थन में अनुच्छेद 21 का हवाला दिया जाता है, लेकिन यह अधिकार कानूनी प्रक्रियाओं और सबूतों से ऊपर नहीं है। गंभीर आरोपों और ठोस सबूतों की स्थिति में केवल जीवन के अधिकार के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।
अन्य आरोपियों की बेल
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला करते हुए कहा कि बाकी 5 आरोपियों को जमानत दे दी है । अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस बेल से ट्रायल प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी और मामले की सुनवाई जारी रहेगी।





