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सुरक्षित मातृत्व एवं नवजात शिशु की देखभाल परिवार की भी जिम्मेदारीः डॉ संतोष

-समय पर जांच, पौष्टिक भोजन, परिवार का सहयोग सुरक्षित मातृत्व की कुंजी विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष……. हमीरपुर, 06 अप्रैल (हि.स.)। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी कोरोना जैसे विपरीत समय मे भी विश्व स्वास्थ्य दिवस 7 अप्रैल को मनाया जा रहा है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के आँकड़ों के अनुसार प्रति दस हजार गर्भवती महिलाओं में भारत मे 113 महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। वहीं उत्तरप्रदेश अकेले में ही ये आंकड़ा प्रति 10 हजार में 197 है। वहीं अगर बात केवल बुन्देलखण्ड की की जाए तो ये आंकड़ा 225 के करीब हो सकता है। देश के पिछड़े क्षेत्रों में एक बुन्देलखण्ड में गर्भावस्था में महिला सुरक्षा को लेकर लंबे समय से अभियान चला रहीं सुप्रसिद्ध गायनोलॉजिस्ट व बृजरानी हॉस्पिटल राठ की एमडी डॉ संतोष सिंह ने विश्व स्वास्थ्य दिवस के लिए खास बातचीत में बताया कि गर्भावस्था के पूर्व, दौरान व बाद में महिलाओं को किन किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बताया कि सबसे पहले गर्भ धारण करते ही महिलाओं को निकटतम स्वास्थ्य केंद्र में अपना रजिस्ट्रेशन कराना चाहिए। महिलाओं को प्रसव पूर्ण चार जांचे ( एंटी नेटल चेकअप) कराना बहुत आवश्यक है। पहली जांच माहवारी छूटते ही या माहवारी छूटने के तीन महीने के अंदर, दूसरी चौथे से छठे महीने, तीसरी गर्भावस्था के सातवें से आठवें महीने में व आखिरी जाँच गर्भावस्था के नवें महीने में कराना चाहिए। नियमित रूप से प्रसवपूर्व जांच जच्चा एवम बच्चे को जटिलताओं से बचाता है और दोनों को स्वस्थ्य रखता है। डॉ सिंह ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपने खाना पीना का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दौरान उन्हें प्रचुर कैल्सियम, प्रोटीन और विटामिन युक्त पदार्थ जैसे दूध, दही , छाछ , पनीर ,मौसमी फल, सब्जियां, छिलके वाले अनाज, दालें, हरा साग, मुठ्ठी भर मूंग फली के दाने और कम से कम दो कप दाल से शाकाहारी महिलाओं की प्रोटीन की दैनिक जरूरतें पूरी हो जातीं है। मांसाहारी महिलाओं के लिए मांस, अंडा,मुर्गा, मछली प्रोटीन विटामिन व लौह तत्व के अच्छे श्रोत हैं। इसके साथ साथ साफ सफाई के लिए बार बार हाथ धोना व नियमित रूप से नाखून काटना और आठ घण्टे रात में और कम से कम दो घण्टे दिन में आराम करें। भारी सामान उठाने व कड़ी मेहनत से बचें। और बाएं करवट लेटें क्योंकि इससे गर्भस्थ शिशु की खून की आपूर्ति बढ़ जाती है। कहा कि महिलाओं को इस दौरान तनाव मुक्त रहना चाहिए और भारी सामान उठाने व कड़ी मेहनत वाले काम से बचना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान अगर पेट मे तेज दर्द, कमजोरी महसूस होना, जल्दी थक जाना, सांस फूलना, पैरों में बेहद सूजन होना, योनि से खून बहना, दौरे पड़ना व बुखार आने जैसी समस्याएं खतरे का संकेत होती हैं। इस दौरान तुरन्त ही चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। आखिरी महीने में अगर योनि से खून बहना, गर्भस्थ शिशु की हरकतों में कमी या हरकत न होना, 9 महीने की गर्भवस्था से पहले प्रसव पीड़ा या रिसाव, 12 घण्टे से अधिक रिसाव बिना प्रसव पीड़ा के 12 तक लगातार प्रसव पीड़ा होना व पेट मे लगातार दर्द हो तो तुरंत ही सीएचसी स्तर के अस्पतालों में सम्पर्क करना चाहिए। इस दौरान पारिवारिक सहयोग की आवश्यकता भी बहुत होती है। जिससे स्वस्थ्य शिशु जन्म लेता है। डॉ सिंह ने कहा कि पति और सास द्वारा देखभाल व सहयोग और सहारा गर्भावस्था के दौरान भावनात्मक सहारा और भरोसा पैदा करता है। प्रसव पश्चात कम से कम 48 घण्टे तक प्रसव केंद्र में रहें क्योंकि जच्चा व बच्चा में जटिलताएं इसी समयांतराल के बीच में होती हैं। नवजात शिशु को प्रसव के दिन , प्रसव के तीसरे व सातवें दिन और 6 सप्ताह बाद किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा देखा जाना चाहिए। शिशु को पहले पोलियो की खुराक, हेपेटाइटिस बी और बीसीजी के टीके लगवाये जाने चाहिए। केंद्र में नाल की देखभाल,बच्चे को गर्म रखने, सांस सम्बन्धी संक्रमण, दस्त, पोषण और परिवार नियोजन के बारे में भी सलाह दी जाती है। स्तनपान की जरूरत को पूरा कराने के लिए अतिरिक्त भोजन और पेय अवश्य लेना चाहिए। हिन्दुस्थान समाचार/ पंकज/

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