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अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही माकपा ने अपनी कई परंपरागत सीटें आईएसएफ को दीं

कोलकाता, 17 मार्च (हि.स.)। पश्चिम बंगाल की सत्ता पर तीन दशक तक लगातार शासन करने वाले वामपंथी दल आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वाममोर्चा ने अपनी कई परंपरागत सीटें गठबंधन धर्म के नाम पर नवनिर्मित पार्टी इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) को दे दी हैं। आईएसएफ ने ओवैसी का साथ छोड़ कर माकपा-कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है। हुगली जिले के दरगाह फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी आईएसएफ का अल्पसंख्यक वोट पर दबदबा है। इसी आधार पर पीरजादे की धौंस के आगे माकपा ने हथियार डाल दिए और अपनी कई परंपरागत जनाधार वाली सीटें आईएसएफ की झोली में डाल दी हैं। जिससे पार्टी के धर्मनिरपेक्ष रवैए को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। इनमें रायपुर, महिषादल, चंद्रकोना, कुलपी, मंदिरबाजार, जगतबल्लभपुर, हरिपाल, खानाकुल, मटियाब्रुज, उलबेरिया, राणाघाट उत्तर व पूर्व, कृष्णगंज, संदेशखाली, चापड़ा, अशोक नगर, आमडांगा, आसनसोल उत्तर, इंटाली, कैनिंग पूर्व, जंगीपाड़ा, मध्यमग्राम, हाड़ोआ, मयूरेश्वर और मगराहाट पूर्व की सीटें शामिल हैं। इन सभी सीटों पर 2011 से पहले तक माकपा के विधायक थे। इनमें कैनिंग पूर्व से जीतकर अब्दुर रज्जाक मोल्ला लंबे समय तक मंत्री रहे थे। मटियाब्रुज से निर्वाचित होकर एक समय मोहम्मद अमीन मंत्री बने थे। इसी तरह आमाडांगा से अब्दुस सत्तार वाममोर्चा सरकार के मंत्रिमंडल में थे।वहीं, इंटाली से जीतकर हाशिम अब्दुल हलीम विधानसभा स्पीकर बने थे। सूत्रों के मुताबिक आइएसएफ के साथ सीटों के बंटवारे के समय पहले जो माकपा नेता बातचीत कर रहे थे, वे इन सीटों को छोडऩे के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए दोनों दलों में बात बन नहीं पा रही थी। तब माकपा ने एक अन्य वरिष्ठ नेता को बातचीत में लगाया गया, जिन्होंने इन सीटों पर माकपा की मौजूदा स्थिति को देखते हुए आइएसएफ के लिए छोडऩे के लिए पार्टी नेतृत्व को राजी कर लिया। दरअसल, माकपा नहीं चाहती थी कि सीटों के विवाद को लेकर आइएसएफ से समझौता टूटे। बुधवार को इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक सेल के अध्यक्ष हाजी नुरूल इस्लाम ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि माकपा के कार्यकर्ता ही आइएसएफ में शामिल हुए हैं। अब माकपा की स्वीकार्यता खत्म हो गई है, इसलिए अब वे लोग आइएसएफ के छद्म वेश में राजनीति कर रहे हैं। इस पर माकपा की राज्य कमेटी के एक नेता ने कहा कि गठबंधन को शक्तिशाली करने के लिए पार्टी ने यह त्याग किया है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि माकपा ने आइएसएफ के लिए जो सीटें छोड़ी हैं, वहां अब उसका प्रभाव अब्बास सिद्दीकी की पार्टी से बहुत कम है। हिन्दुस्थान समाचार / ओम प्रकाश

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