back to top
19.1 C
New Delhi
Wednesday, April 1, 2026
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

त्वरित टिप्पणीः कश्मीर में राजनीतिक बर्फ पिघलने के संकेत

डॉ. प्रभात ओझा बात से ही बात बनती है। इसे केंद्र सरकार ने समय से समझा और जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक हालात सुधरने के संकेत मिलने लगे हैं। गुरुवार 24 जून को देश की राजधानी में प्रधानमंत्री और सूबे के करीब हर दल के नेताओं की बातचीत को सकारात्मक कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू में ही कहा कि ये बातचीत पहले हो सकती थी, पर कोरोना इसमें बाधक बनी। मोदी की बात को बैठक में मौजूद हर किसी ने समझा और लगता है कि समझ पैदा करने के लिए बातचीत आगे बढ़ी। बातचीत पर केंद्र सरकार की ओर से कोई बयान अथवा सूबाई नेतृत्व का संयुक्त बयान नहीं आया। सूबे के नेता जरूर अलग-अलग बोले हैं। इन सभी में एक बात सामान्य है कि स्थायी शांति और राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत जल्द से जल्द होने के सभी हिमायती हैं। इस तरह की बातें प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट और जम्मू-कश्मीर के नेताओं के बयान, दोनों में ही मिलते हैं। प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में जो कहा, उसका लबोलुवाब ये है कि राज्य में चुनाव होने चाहिए ताकि लोगों को एक लोकतांत्रिक सरकार मिले। जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश घोषित किए जाने के बाद प्रधानमंत्री की पहल पर यह पहली बैठक थी। बैठक में सूबे के नेताओं की तरफ से जो बयान आये हैं, उनमें खास बात यह है कि अनुच्छेद 370 और 35ए पर किसी ने कुछ कहा तो वह रस्मी ही लगता है। बैठक के बारे में भी पता चल रहा है कि वहां 370 और 35ए का मुद्दा उठा ही नहीं। बातचीत का सकारात्मक पक्ष यही हुआ करता है। सर्वोच्च न्यायालय में यह मसला है और सभी मानकर चल रहे होंगे कि फैसले का इंतजार करना चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जरूर इस मुद्दे को कुछ अलग ढंग से रखा। उनके मुताबिक, अगर धारा 370 को हटाना था तो जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को बुलाकर इसे हटाना चाहिए था। बकौल उन्हीं के उन्होंने बैठक में कहा कि हम धारा 370 को संवैधानिक और कानूनी तरीके से बहाल करना चाहते हैं। साफ बात है कि 370 बहाली के लिए वे भी देश के संविधान और कानून की बात कर रही हैं। महबूबा मुफ्ती प्रायः अलगाववादियों और मुख्यधारा के बीच की राय लेकर चला करती हैं। उनके बयान पाकिस्तान से बातचीत तक जाते हैं, इस बार भी यह दिखा। बैठक में राज्य में शांति के लिए हर पक्ष से बातचीत करने की खुद की गई प्रशंसा की जानकारी देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री जोड़ गईं कि पाकिस्तान से बात करनी चाहिए। महबूबा बड़ी सावधानी से केंद्र को घेरने की कोशिश करती हैं, साथ ही भारतीय संविधान के प्रति सचेत रहती हैं। तभी तो कहती हैं, "पांच अगस्त 2019 को असंवैधानिक तरीक़े 370 को हटाया वह वहां के लोगों को मंज़ूर नहीं है। हम प्रजातांत्रिक, संवैधानिक तरीक़े से उसकी बहाली की लड़ाई लड़ेंगे। ये हमें पाकिस्तान से नहीं मिला था। इसके अलावा हमने कहा कि आप चीन के साथ बात कर रहे हैं, जहां लोगों की भागीदारी नहीं है। अगर जम्मू-कश्मीर के लोगों को सुकून मिलता है तो आपको पाकिस्तान से बात करनी चाहिए। हमारा व्यापार बंद है। उसे लेकर बात की जानी चाहिए।” पूर्व मुख्यमंत्री के बयान का लंबा उद्धरण इसलिए देना जरूरी लगा, क्योंकि इससे उनकी मनोस्थिति का पता चलता है। वे 370 को भारत के अंदर ही मिली विशेष स्थिति बताती हैं और बड़ी समझदारी से व्यापार आदि के लिए पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करती हैं। महबूबा की इस कमतल्खी को छोड़ दें तो उनके सहित हर प्रांतीय नेता की धारणा साफ दिखी कि राज्य में राजनीतिक प्रक्रिया जल्द शुरू हो। वे सभी जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा शीघ्र चाहते हैं। प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और उप राज्यपाल ने भी तो समय पर ऐसा करने की बात कही है। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने, यथाशीघ्र लोकतंत्र की बहाली और विधानसभा चुनाव कराने, कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास को सुनिश्चित करने, राजनीतिक बंदियों की रिहाई तथा प्रवासन नीति में बदलाव जैसी पांच प्रमुख मांगें रखीं। नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला भी कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कर विश्वास कायम करना जरूरी है। वे संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जे को समाप्त किए जाने को कानूनी एवं संवैधानिक माध्यम से चुनौती देते रहने की बात करते हैं। फिलहाल, इससे किसी को दिक्कत भी नहीं है। तो गुलाम नबी आजाद, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती कमोबेश एक ही बात कहते हैं। उनके बयान एक राष्ट्रीय और राज्य के दो प्रमुख दलों का रुख प्रकट करते हैं। राज्य के एक अन्य नेता अल्ताफ बुखारी का बयान ध्यान देने के काबिल है कि केंद्र सरकार के रोडमैप से साफ है कि पहले परिसीमन होगा और इसके बाद चुनाव होंगे। सज्जाद लोन ने बैठक को सद्भावपूर्ण, उम्मीदों से भरा बताया। प्रधानमंत्री ने बैठक में दिल्ली और दिल की दूरी कम करने की बात कही। बैठक का मकसद भी यही रहा। यह दूरियां कम होती दिखने लगी हैं। इसे जम्मू-कश्मीर और पूरे देश के लिए बेहतर संकेत माना जा सकता है। हिन्दुस्थान समाचार

Advertisementspot_img

Also Read:

दिल्ली बम ब्लास्ट में कश्मीर कनेक्शन? धमाके के बाद उमर का नाम आया सामने, परिजनों ने दी सफाई

नई दिल्‍ली, रफ्तार डेस्‍क । दिल्ली के लाल किले के पास हुए कार धमाके में जम्मू-कश्मीर निवासी उमर के शामिल होने की आशंका जताई...
spot_img

Latest Stories

ऑफिस और ट्रैवल में चाहिए ग्लोइंग स्किन? बैग में रखें ये जरूरी चीजें

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। आज के समय में ऑफिस...

Budhwar Mantra: गणेश भगवान के इन मंत्रों का करें जाप, घर पर बनी रहेगी तरक्की

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। आज बुधवार के दिन आप...
⌵ ⌵ ⌵ ⌵ Next Story Follows ⌵ ⌵ ⌵ ⌵