back to top
24.1 C
New Delhi
Saturday, April 11, 2026
spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

सावधान! डायबिटीज़ के लिए इस दवा का कर रहे हैं इस्तेमाल तो रुक जाइए, नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

नए रिसर्च में चेतावनी दी गई है कि टाइप 2 डायबिटीज की कुछ दवाएं लंबे समय में ब्लड शुगर कंट्रोल कमजोर कर सकती हैं, इसलिए मरीजों को डॉक्टर की निगरानी में ही दवा लेनी चाहिए।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए जो दवाएं सालों से दी जा रही हैं, वही बीमारी को धीरे-धीरे और गंभीर बना सकती हैं। स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना की एक नई स्टडी में टाइप 2 डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सल्फोनिल्यूरिया कैटेगरी की दवाओं को लेकर चौंकाने वाली चेतावनी दी गई है। रिसर्च के मुताबिक, ये दवाएं शुरुआत में ब्लड शुगर कंट्रोल करती हैं, लेकिन लंबे समय में उल्टा असर डाल सकती हैं।

डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है। खासतौर पर टाइप 2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इंसुलिन अग्न्याशय की बीटा कोशिकाएं बनाती हैं, जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन हालिया रिसर्च बताती है कि इन्हीं बीटा कोशिकाओं पर कुछ दवाओं का नकारात्मक असर पड़ सकता है।

क्या कहती है रिसर्च?

जर्नल Diabetes, Obesity and Metabolism में प्रकाशित इस स्टडी के अनुसार, सल्फोनिल्यूरिया दवाएं जैसे ग्लिबेनक्लामाइड बीटा कोशिकाओं को ज्यादा इंसुलिन रिलीज करने के लिए मजबूर करती हैं। स्टडी के लीड प्रोफेसर एडुआर्ड मोंटान्या ने बताया कि ये दवाएं कई दशकों से टाइप 2 डायबिटीज में दी जा रही हैं और कई देशों में जेनरिक रूप में आसानी से उपलब्ध हैं। हालांकि, लंबे समय तक इनके इस्तेमाल से बीटा कोशिकाओं की सेहत और उनकी पहचान पर बुरा असर पड़ सकता है।

बीटा कोशिकाएं क्यों हो रही हैं कमजोर?

रिसर्च में सामने आया कि ये कोशिकाएं मरती नहीं हैं, बल्कि अपनी पहचान खोने लगती हैं। लंबे समय तक ग्लिबेनक्लामाइड लेने से उन जीन की एक्टिविटी कम हो जाती है जो इंसुलिन बनाने के लिए जरूरी हैं। इसके अलावा, दवाएं कोशिकाओं के अंदर मौजूद एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम में तनाव पैदा करती हैं, जिससे बीटा कोशिकाएं सही तरह से काम नहीं कर पातीं।

दवा क्यों हो जाती है बेअसर?

विशेषज्ञों के मुताबिक, कई मरीजों में देखा गया है कि जो दवाएं शुरुआत में असरदार होती हैं, वही कुछ साल बाद कम प्रभावी हो जाती हैं। इसकी वजह बीटा कोशिकाओं की पहचान का धीरे-धीरे खत्म होना है। इससे ब्लड शुगर कंट्रोल कमजोर पड़ने लगता है और शुगर लेवल फिर बढ़ने लगता है। अच्छी बात यह है कि यह स्थिति स्थायी नहीं होती और सही इलाज से कोशिकाओं की क्षमता दोबारा लौट सकती है।

मरीजों के लिए क्या है चेतावनी?

डॉक्टरों का कहना है कि मरीज बिना सलाह के दवा बंद न करें। हालांकि यह स्टडी बताती है कि लंबे समय तक सल्फोनिल्यूरिया दवाओं के इस्तेमाल से समय के साथ डोज बढ़ाने या नई दवाएं जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ती है। इसलिए डायबिटीज के इलाज में नियमित जांच और सही मेडिकल गाइडेंस बेहद जरूरी है।

Advertisementspot_img

Also Read:

spot_img

Latest Stories

⌵ ⌵ ⌵ ⌵ Next Story Follows ⌵ ⌵ ⌵ ⌵