नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। इन दिनों गुरुग्राम के लेबर चौक पर लेबर नहीं दिखते हैं। यह चौक विरान हो गया है। ऐसा इस कारण से नहीं हुआ है कि लेबर घर जा रहे हैं, बल्कि ऐसा इस कारण से हुआ है क्योंकि हरियाणा में होने वाले चुनावों को लेकर रैलियां हो रही हैं और इनमें जाकर ये लेबर क्लास रोजाना 800 से 1000 रुपये कमा रहे हैं। चुनावी रैलियों में शामिल करने के लिए इन लेबरों को खरीदा जा रहा है।
परिवार संग रैली में जाते हैं लेबर
आठ साल से गुरुग्राम में रह रहे बिहार के मजदूर सुंदर ने पीटीआई को बताया कि अधिकतर पार्टियों को अपनी रैलियों में भीड़ चाहिए होती है। इस तरह के काम में मेहनत भी कम लगती है। हर रैली में 800 रुपये से 1000 रुपये कमा रहे हैं। इस कारण से सुंदर अपने परिवार सहित रैलियों में चले जाते हैं।
सुंदर की पत्नी घरों में काम करती है। वो जो काम करती है वहां पर नहीं जाने पर पैसे काट लिया जाता है। जितना पैसा कटता है उससे कई बेहतर रैलियों में मिल जाता है। साथ ही यहां पर खाना भी मुफ्त मिलता है।
काम नहीं मिलने के कारण रैलियों में हो जाते हैं शामिल
उत्तर प्रदेश के बलिया के एक मजदूर मोहन ने पीटीआई को बताया कि कंस्ट्रक्शन का काम मौसम के हिसाब से होता है। बारिश शुरू होने के बाद से काम भी कम हो जाता है। अक्टूबर और नवंबर दिवाली और छठ के महीने हैं, इसलिए मजदूर लंबी छुट्टी पर घर चले जाते हैं। सर्दियों के मौसम में भी प्रदूषण के कारण निर्माण कार्य में रोक लग जाती है। इस दौरान काम नहीं मिलता है। इस कारण से पार्टी की रैलियों में शामिल हो जाता हूं।
रैलियों में भीड़ जमा करने के लिए टैक्सी ड्राइवरों को एकत्रित किया जाता है
रैलियों में भीड़ जमा करने की जिम्मेदारी कार्यकर्ताओं की होती है। रैली में भीड़ इकट्ठा करने के लिए नेटवर्किंग का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा भीड़ जमा करने के लिए टैक्सी ड्राइवरों को भी एकत्रित किया जाता है। इन लेबरों को एक दिन की दिहाड़ी पर भुगतान किया जाता है।





