नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । पूजा स्थल अधिनियम, 1991 हाल ही में काफी चर्चा में रहा है और देश भर में पूजा स्थलों को लेकर काफी विवाद चल रहा है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। अब पूजा स्थल कानून 1991 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में आज यानि बुधवार को सुनवाई होने जा रही है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ के समक्ष होगी।
इस मामले में अब तक कुल छह याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, इसमें विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ डाॅ. इसमें सुब्रमण्यम स्वामी, अश्विनी उपाध्याय और जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका भी शामिल है। एक पक्ष ने जहां इस कानून को रद्द करने की मांग की है, वहीं जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसके समर्थन में याचिका दायर की है। दरअसल, ंभल के शाही जामा मस्जिद मामले में निचली अदालत के फैसले के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर जल्द सुनवाई की मांग की थी। पूजा स्थल अधिनियम 1991 को हिंदू पक्ष ने 2020 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जबकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 2022 में इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
यह है पूजा स्थल अधिनियम 1991
पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के अनुसार, 15 अगस्त 1947 के समय पूजा स्थल जिस भी स्थिति में था, वह वैसा ही रहेगा और उसके चरित्र में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। यह अधिनियम 1991 में तत्कालीन प्रधान मंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान पारित किया गया था। हालाँकि, अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले को छोड़ दिया गया था। मुस्लिम पक्ष इसी को आधार बनाकर बार-बार अपनी बात रखना आया है, इसका कहना है कि जब कानून संसद में बना दिया गया तब हिंदू पक्ष द्वारा किसी भी मस्जिद पर अपना दावा मंदिर कहकर ठोकना सही नहीं है, जबकि हिंदू पक्ष का कहना है कि जो हमारे आस्था केंद्र हैं उन्हें मुसलमानों से वापस मिलना चाहिए, क्योंकि इन सभी स्थलों को वापस लेने की मांग तभी से चल रही है जब विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने इस्लाम की आंधी के चलते हमारे मंदिरों को तोड़ दिया और वहां जबरन मस्जिद खड़ी कर दी गई।
हिंदू पक्ष का क्या कहना है?
हिंदू पक्ष का कहना है कि जिन आक्रांताओं ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई वे विदेशी थे और उन विदेशियों से भारत का कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए । विदेशी आक्रांता मर गए, उन्होंने जो गलत किया अब उसे भारत में रहने वाले मुसलमानों को उससे निजात पानी चाहिए और ऐसे सभी मंदिर जो तथ्यों पर आधारित है और आज की दिनांक में वहां इस्लामी प्रैक्टिस हो रही है उन सभी को हिंदू पक्ष को सौंप दिया जाए ताकि वह अपनी आस्था और विश्वास के अनुसार वहां पूजा अर्चना कर सकें। इसके साथ ही हिंदू पक्ष शुरू से भारत में वक़्फ़ बोर्ड पर भी अपना विरोध दर्ज कराता रहा है। क्योंकि वक़्फ़ बोर्ड कहीं भी अपना दावा ठोक देता है और इससे प्रभावित लोगों को फिर न्यायालय के चक्कर लगाने होते हैं। जिसमें कि नियमानुसार प्रारंभ में उसे वक़्फ़ बोर्ड ट्रिब्यून के सामने ही कई बार पेश होना पड़ता है। तमाम साक्षी होने के बाद भी कई लोगों की जमीन वक़्फ़ बोर्ड ने अपना बताकर हथिया ली है, इसलिए इस कानून का भी देश भर में हिंदू पक्ष द्वारा विरोध किया जा सकता है।




